कांग्रेस हाईकमान भले ही नवजोत सिद्धू और चरणजीत सिंह चन्नी में से किसी एक को अगला मुख्यमंत्री घोषित करना चाह रही है लेकिन इस पद की दौड़ में अब तक तीन अन्य नेता भी खुलकर सामने आ चुके हैं। इनमें सबसे पहले सुखजिंदर सिंह रंधावा हैं, जिनका कहना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद जाट सिख नेता के रूप में उनका चुनाव हो गया था, जिसे अंतिम समय में बदल दिया गया।
दूसरे नेता, प्रताप सिंह बाजवा हैं, जो पूर्व प्रदेश प्रधान भी हैं। चन्नी को सीएम बनाए जाने की चर्चाओं के जवाब में उनका कहना है कि अगर चन्नी सीएम बन सकते हैं तो वह (प्रताप बाजवा) क्यों नहीं। मुख्यमंत्री पद के तीसरे दावेदार पूर्व प्रदेश प्रधान सुनील जाखड़ भी खुलकर सामने आ गए हैं। उन्होंने इस पद अपनी दावेदारी को बहुमत के साथ सार्वजनिक किया है कि कैप्टन के बाद नया सीएम चुनते समय 42 विधायकों का उन्हें समर्थन हासिल था, जबकि नवजोत सिद्धू को 6 और चन्नी के केवल 2 का समर्थन था। इस तरह जाखड़ ने सीधे तौर पर यह भी साबित करने का प्रयास किया है कि प्रदेश कांग्रेस में चन्नी और सिद्धू के समर्थन में कोई हवा नहीं है।
सिद्धू या चन्नी, फैसला लेना आसान नहीं
कांग्रेस हाईकमान ने फोन कॉल के जरिये नवजोत सिद्धू और चरणजीत चन्नी के समर्थन में सर्वे तो शुरू कर दिया है। फिर भी माना जा रहा है कि अनुसूचित जाति के सिख चन्नी और जाट सिख सिद्धू में से किसी एक का अगले मुख्यमंत्री के तौर पर चुनाव आसान नहीं है। चुनाव के समय हाईकमान का फैसला प्रदेश में वोटों के जातिगत समीकरण को भी गड़बड़ा सकता है।
राज्य में 32 फीसदी जनता अनुसूचित जाति वर्ग और 30 फीसदी जाट सिख से है। बाकी समुदाय करीब 40 फीसदी हैं। पार्टी के भीतर इस समय कांग्रेस नेताओं का चन्नी को इसलिए समर्थन मिल रहा है क्योंकि वह पार्टी के हर व्यक्ति को आसानी से उपलब्ध रहे हैं। सौ दिन के कार्यकाल में वह कांग्रेस के सभी छोटे और बड़े नेताओं व कार्यकर्ताओं की पहुंच में थे। हालांकि चन्नी को सीएम फेस घोषित करने पर जाट सिख वर्ग और उच्च वर्ग को कठिनाई होगी। वहीं चन्नी की जगह सिद्धू को सीएम घोषित करने पर अनुसूचित जाति वर्ग की नाराजगी कांग्रेस को महंगी पड़ सकती है।