मिलिए एक ऐसे शख्स से, जिन्हें 30 साल हो गए साहित्य की दुनिया में और 160 से ज्यादा किताबें लिख चुके हैं। इस दौरान उन्होंने 14 भाषाएं सीख डालीं। अगर आप भीड़ से अलग दिखना चाहते हैं तो इसके लिए अलग सोच और अलग राह का दामन थामना पड़ता है। चित्रकला और साहित्य से बहुत लोग जुड़े हैं। इसीलिए अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए मैंने विभिन्न भाषाओं में साहित्य लिखना शुरू किया।
यह कहना है जाने माने चित्रकार व लेखक डॉ. मोहम्मद रफी का, जो पिछले 30 साल से साहित्य के क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे हैं। उनकी 160 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।वह चंडीगढ़ में रहते हैं और पंजाब शिक्षा विभाग में एडीपीआई हैं। अमर उजाला के साथ एक खास बातचीत दौरान उन्होंने अपने बारे में कुछ दिलचस्प बातें सांझा कीं।
उन्हीं के शब्दों में, ‘मेरा जन्म 1958 में जिला संगरूर के मलेरकोटला में हुआ। जब कॉलेज में दाखिल हुआ तो डिबेट, पोएट्री, पेंटिंग की प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू कर दिया। कविता मैंने कहीं से सीखी नहीं और मैं यह मानता हूं कि जो दिल से निकलता है वही कविता होती है। जब मैंने कविता, कहानी और चित्रकला की रचना तो शुरू कर दी लेकिन मुझे एहसास हुआ कि यह मेरी मंजिल नहीं है। मुझे इससे आगे जाना है और अपनी अलग पहचान बनानी है।
यही सोच लेकर मैंने और भाषाएं सीखनी शुरू की। मुझेे बोलने का काफी शौक है। इस शौक को मैंने रेडियो प्रोग्राम होस्ट करके पूरा किया। रंगों से खेलना मुझे अच्छा लगता है, और हर बार उसमें कुछ नया लाने की कोशिश करता हूं। एक लेखक का माइंड उसकी पेंटिंग में भी साफ दिखाई देता है। जो बातें मैं शब्दों के जरिए बयां नहीं कर पाता उसे मैं पेंटिंग के जरिए दिखाने की कोशिश करता हूं ।
पंजाबी, ऊर्दू, हिंदी, पर्सियन, इंग्लिश जैसे विषयों में एमए की डिग्री हासिल करने वाले डॉ. मोहम्मद रफी हिंदुस्तान की 14 भाषाएं जानते हैं। उन्होंने ऊर्दू भाषा में पीएचडी की है। वह थिएटर आर्टिस्ट भी हैं। अपनी पेंटिंग्स का इस्तेमाल अपने नाटकों में मंच पर भी करते हैं। उन्होंने धार्मिक ग्रंथ कुरान शरीफ का पंजाबी (आडियो) में अनुवाद किया जो यूट्यूब पर भी उपलब्ध है। वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुशायरों और सेमिनार में भाग ले चुके हैं।