चैस ने सिखाया तनावमुक्त रहना
अर्पित ने बताया कि वह नेशनल साइंस ओलंपियाड और इंटरनेशनल मैथमेटिक्स ओलंपियाड में तीन बार गोल्ड मेडलिस्ट रह चुके हैं और राज्य स्तर के शतरंज के खिलाड़ी भी हैं। अर्पित ने चैस खेलना अपने दादा के साथ शुरू किया। इसका फायदा यह हुआ कि अर्पित कभी अपने ऊपर तनाव हावी नहीं होने देते। इसका फायदा उन्हें नीट के एग्जाम की परीक्षा के दौरान जरूर हुआ। डॉक्टर बनने का लक्ष्य रखने वाले अर्पित ने 10वीं में अपने पिता को गंभीर बीमारी के चलते खो दिया और इस सदमे को ‘सेटबेक’ के रूप में नहीं बल्कि एक ‘चैलेंज’ के रूप में लिया। परिवार की खुशी के लिए अर्पित ने दिन रात एक कर दिया।
मां ही है मेरी रोल मॉडल
एक फार्मा कंपनी में कार्यरत अर्पित की मां प्रीति नारंग ने बताया कि अर्पित का लगाव मेडिकल लाइन के प्रति बचपन से ही था। जब वह पीजीआई में अकाउंट्स विभाग में कार्यरत अपनी सास से मिलने जाती थी तो अर्पित अपनी दादी से और कुछ पलों के लिए आसपास के डॉक्टरों से बातचीत करता था। अर्पित को डॉक्टर बनने की प्रेरणा यहीं से मिलनी शुरू हो गई थी लेकिन पिता को खोने के सदमे के बाद वह प्रेरणा एक उद्देश्य के रूप में तब्दील हुई। इसका फल उसने पंजाब टॉपर और ऑल इंडिया रैंक में 7वां स्थान पाकर हासिल किया। अर्पित ने बताया कि मां उनकी रोल मॉडल मां हैं।
पढ़ने के लिए नॉवेल देते थे मितुल सर
अर्पित ने बताया कि उन्होंने पहले अपनी पढ़ाई चंडीगढ़ के सेंट जेवियर स्कूल से शुरू की। इसके बाद वह जीरकपुर शिफ्ट हो गए। जीरकपुर आने के बाद उन्होंने दीक्षांत इंटरनेशनल स्कूल में सेकेंड क्लास में दाखिला लेकर पढ़ाई शुरू की और स्कूल की टीचर्स ने हमेशा किसी न किसी रूप में पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। स्कूल की मैथ टीचर लीना मल्होत्रा से काफी प्रभावित हैं। उन्होंने क्लास के बाद एक्सट्रा क्लास लगाकर सवालों को समझने में मेरी मदद की जबकि दीक्षांत स्कूल्स ऑफ ग्रुप के चेयरमैन मितुल दीक्षित सर अक्सर उन्हें नॉवेल पढ़ने के लिए देते थे जिसकी मदद से हमेशा नई-नई जानकारियां मिलती थीं।