आनंद महिंद्रा, महिंद्रा एंड महिंद्रा (एमएंडएम) समूह के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक हैं। उनके दादा जे.सी. महिंद्रा ने पंजाब के लुधियाना में, 1955 में कंपनी की सह-स्थापना की थी। उसी साल एक मई को आनंद महिंद्रा का जन्म हुआ था। अब 67 साल के हो चुके आनंद महिंद्रा कंपनी से रिटायर होकर के मार्गदर्शक की भूमिका में नजर आएंगे।
आनंद महिंद्रा के पास 11300 करोड़ रुपये की सपंत्ति है। फोर्ब्स की सूची में इनका 88वां स्थान है। कंपनी का 80 देशों में कारोबार है। 64 वर्षीय आनंद अप्रैल 2020 से नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन होंगे। एमएंडएम का ऑटोमोबाइल से लेकर के सॉफ्टवेयर कंपनियों तक का कारोबार है।
आनंद महिंद्रा के दादा का नाम जगदीशचंद्र माहिंद्रा व केलाशचंद्र माहिंद्रा था। पिता का नाम हरीश महिंद्रा और माता का नाम इंदिरा महिंद्रा था। इनकी पढ़ाई भारत से बाहर अमेरिका के हार्वर्ड कॉलेज (कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स) के डिपार्टमेंट ऑफ विज्युल एंड एनवायरॉनमेंटल स्टडीज से हुई, फिर इन्होंने सन 1981 में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल (HBS) बोस्टन, मैसाचुसेट्स से एमबीए की पढ़ाई पूरी की।
स्टील ट्रेडिंग कंपनी के रूप में स्थापित ग्रुप आज कृषि व्यवसाय से लेकर एयरोस्पेस तक कई क्षेत्रों में मौजूद है। यह बाजार के नेतृत्व वाले कई प्रतिष्ठित भारतीय औद्योगिक घरों में से एक माना जाता है, जिनमें उपयोगिता वाहन, ट्रैक्टर बाजार के बाद (भारत की सबसे बड़ी मल्टी-ब्रैंड की पूर्व-स्वामित्व वाली कार कंपनी), छुट्टियाँ (भारत की सबसे बड़ी छुट्टी मालिकाना कंपनी) और आईटी (शीर्ष 5 आईटी सेवा प्रदाता) कंपनी है।
सोशल मीडिया पर आनंद महिंद्रा सबसे ज्यादा सक्रिय रहने वाले कारोबारी हैं। ट्विटर पर उनके 73.7 लाख फॉलोअर हैं। आनंद महिंद्रा का मानना है कि 'जब आप बड़े फेडरेशन का हिस्सा होते हैं तो यह पता लगाना असंभव हो जाता है कि क्या चल रहा है। ऐसे में ट्विटर ऐसा जरिया है, जिससे आप छोटे-बड़े कर्मचारी, ग्राहकों से सीधा संवाद कर सकते हैं।'
सन 2002 में इन्होंने अपने कुशल बुद्धि से ‘स्कॉर्पियो’ नामक एक वाहन का निर्माण किया, जो आज के समय में पूरे विश्व में अपना नाम कर रहा है। इस वाहन को बनाते वक्त के अपने अनुभव को साझा करते हुए महिंद्रा ने लिखा दो दशक पहले की बात है। हम अपनी क्षमताओं को लेकर के आशंकित थे। इसलिए अमेरिकी कंपनी फोर्ड मोटर्स के साथ संयुक्त उपक्रम बनाया। उस समय हम स्कॉर्पियो पर काम कर रहे थे। जब हमने स्कॉर्पियो का मॉडल फोर्ड के अधिकारियों को दिखाया तो वे इम्प्रेस हुए, लेकिन फोर्ड चेयरमैन ने लागत बढ़ने का हवाला देकर प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए थे। फोर्ड मना नहीं करती तो हम अपने बलबूते यह इतिहास रचने से वंचित हो जाते।'