भारत के दिग्गज बिजनेसमैन रतन टाटा का 9 अक्तूबर (बुधवार) की देर रात निधन हो गया। मुंबई के ब्रीज कैंडी अस्पताल में रतन टाटा ने आखिरी सांस ली। अपने बाद रतन टाटा बहुत बड़ा साम्राज्य छोड़कर गए हैं। इस समूह में नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं। टाटा ग्रुप का वैल्यूएशन करीब 400 अरब डॉलर के पार है, जो पाकिस्तान की जीडीपी से भी ज्यादा है। इस साल के आखिरी तक पाकिस्तान की जीडीपी 347 अरब डॉलर हो जाने का अनुमान है, जबकि अकेले टाटा समूह का मार्केट वैल्यूएशन करीब 400 अरब डॉलर यानी 33 लाख 58 हजार करोड़ रुपये के बराबर है। हालांकि, एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इतने बड़े कारोबारी साम्राज्य को संभालने वाले रतन टाटा अरबतियों की सूची में कभी शामिल नहीं रहे। इसका कारण हम आपको आगे बताएंगे पहले ये जानिए कि टाटा समूह का संचालन कैसे किया जाता है।
टाटा समूह का संचालन होल्डिंग कंपनी टाटा संस की ओर से किया जाता है। उसके ऊपर टाटा परिवार से जुड़े ट्रस्ट्स हैं, जो परोपकार का काम करते हैं। इन ट्रस्ट्स में भी दो सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट सबसे अहम हैं क्योंकि ये टाटा संस के सबसे बड़े शेयरधारक हैं। इन दोनों ट्रस्ट्स के पास कंपनी की लगभग 52 प्रतिशत हिस्सेदारी है। टाटा के सभी ट्रस्ट्स की टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी में कुल 67 फीसदी की हिस्सेदारी है। अपने निधन तक टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन रतन टाटा ही रहे। ऐसे में उनके जाने के बाद उनकी जिम्मेदारी कौन निभाएगा यह बड़ा सवाल है।
रतन टाटा ने अपनी मृत्यु से पहले किसी उत्तराधिकारी की नियुक्ति नहीं की है। टाटा ट्रस्ट का अगला प्रमुख कौन होगा इसका निर्णय रतन टाटा ने ट्रस्टियों के बोर्ड पर छोड़ दिया था। इसलिए अब उनके निधन के बाद ट्रस्टियों के पास एक नए चेयरमैन का चयन करने का काम करना होगा। अंतिम नाम तय होने से पहले संभावित तौर पर कोई नाम अंतरिम तौर पर तय किए जाने की उम्मीद है।
रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल टाटा (67 साल )का नाम उत्तराधिकारी के तौर पर चर्चा में है। नोएल टाटा 40 साल से टाटा समूह से जुड़े हुए हैं और कंपनियों के बोर्ड में विभिन्न पदों पर काम किया है। वे ट्रेंट, टाटा फाइनेशियल लिमिटेड, वोल्टास और टाटा इंवेस्टमेंट कॉपोरेशन के चेयरमैन हैं। इसके अलावा वे टाटा स्टील और टाइटन कंपनी लिमिटेड के उपाध्यक्ष तथा सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के बोर्ड में ट्रस्टी के तौर पर काम करते हैं। नोएल टाटा की कार्यकारी भूमिका अगस्त 2010 से नवंबर 2021 तक टाटा इंटरनेशनल लिमिटेड के प्रबंध निदेशक के रूप में रही है। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कंपनी का कारोबार 500 मिलियन डॉलर से बढ़ाकर 3 बिलियन डॉलर से अधिक कर दिया। उन्होंने पहले ट्रेंट लिमिटेड का भी प्रबंधन किया, जिसे 1998 में एक स्टोर से बढ़ाकर मौजूदा समय में 700 स्टोर से अधिक तक पहुंचा दिया है।
यूके के ससेक्स विश्विद्यालय से स्नातक उन्होंने आईएनएसईएडी से अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी पाठयक्रम पूरा किया है। वे नवल एच.टाटा और सिमोन एन. टाटा के पुत्र हैं। इस साल की शुरुआत में टाटा समूह ने नोएल टाटा के बच्चों लिआ, माया, और नेविल टाटा को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट समेत पांच परोपकारी ट्रस्टों के बोर्ड में नियुक्त किया। इन नियुक्तियों को तत्कालीन चेयरमैन रतन टाटा ने मंजूरी दी थी और यह 6 मई से प्रभावी हुई। ऐतिहासिक रूप से टाटा ट्रस्ट का नेतृत्व टाटा परिवार और पारसी समुदाय से जुड़ा रहा है। रतन टाटा का कार्यकाल आखिरी था, जब किसी व्यक्ति ने टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष दोनों ही भूमिकाएं संभाली थी।
टाटा ट्रस्ट के नियमों में 2022 में संशोधन किया गया था, जिसमें यह सुनिश्चित किया गया था कि ये भूमिकाएं हमेशा अलग-अलग लोग संभालेंगे। इसके जरूरत के अनुसार संरचनात्मक बदलाव किया जाएगा। रतन टाटा के निधन के बाद यह अटकलें बढ़ गई हैं कि टाटा ट्रस्टस के अध्यक्ष पद पर कौन संभालेगा। भारत के सबसे बड़े व्यापारिक समूह के भीतर की स्थिरता को बनाए रखने के लिहाज से यह महत्पूर्ण पद है। मौजूदा समय में बोर्ड के प्रमुख सदस्यों में टीवीएस के प्रमुख वेणु श्रीनिवासन और पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह शामिल हैं, यह दोनों टाटा ट्रस्ट के उपाध्यक्ष भी है। हालांकि, इनके अध्यक्ष बनने की संभावना काफी कम है, क्योंकि ये परिवार के बाहर से आते हैं। वहीं नोएल टाटा जो कि रतन टाटा के सौतेले भाई हैं और पारसी समुदाय से आते हैं और वे बोर्ड के ट्रस्टी के तौर पर काम कर रहे है। उन्हें रतन टाटा के मजबूत दावेदार के तौर पर देखा जा रहा है। 67 साल की उम्र में, नोएल की नियुक्ति पारसी समुदाय के भीतर ट्रस्ट के प्रमुख के रूप में परिवार के किसी सदस्य को प्राथमिकता देने के साथ मेल खाती है। टाटा समूह में उनका चार दशकों से अधिक का अनुभव उनकी संभावित उम्मीदवारी को और मजबूत करता है।
नोएल टाटा को यदि टाटा ट्रस्ट का अध्यक्ष चुना जाता है तो, वे सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के 11वें अध्यक्ष और सर रतन टाटा ट्रस्ट के छठे अध्यक्ष बनेंगे, जो उस परंपरा को आगे बढ़ाएंगे जिसमें अक्सर पारसियों को शीर्ष पर देखा जाता है। नोएल एक मजबूत दावेदार हैं, लेकिन अंतिम निर्णय 13 ट्रस्टियों के बीच आम सहमति से किया जाएगा, जिसमें रतन टाटा के करीबी विश्वासपात्र मेहली मिस्त्री और रतन टाटा को उत्तराधिकार के मामलों में सलाह देने वाले वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा जैसे अन्य प्रभावशाली व्यक्ति शामिल हैं। इस प्रक्रिया में टाटा की व्यक्तिगत इच्छाओं पर विचार किए जाने की उम्मीद है, जो कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होने के बावजूद ट्रस्टियों को ऐसे निर्णय की ओर ले जा सकती है जो ट्रस्ट के भविष्य के लिए उनके दृष्टिकोण का सम्मान करता हो। नए चेयरमैन अथवा अध्यक्ष पर फैसला बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह टाटा ट्रस्ट्स के भविष्य और टाटा संस के साथ उनके संबंधों को आकार देगा। जो भी चुना जाएगा उसे ट्रस्ट्स के परोपकारी लक्ष्यों और टाटा समूह के व्यावसायिक हितों के बीच नाजुक संतुलन बनाए रखना होगा।
1991 से 2012 तक टाटा संस के चेयरमैन के रूप में रतन टाटा के कार्यकाल ने टाटा समूह को एक भारतीय विरासत घराने से एक वैश्विक विविध समूह में बदल दिया, जिसका बाजार पूंजीकरण 17 गुना बढ़ गया। रतन टाटा के कार्यकाल के दौरान, टाटा समूह का राजस्व लगभग 18,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 5.5 लाख करोड़ रुपये (6 बिलियन डॉलर से 100 बिलियन डॉलर) हो गया। दिसंबर 2012 में आईआईएम बैंगलोर द्वारा प्रकाशित एक पेपर के अनुसार, समूह का बाजार पूंजीकरण लगभग 30,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 5 लाख करोड़ रुपये (9.5 बिलियन डॉलर से 91.2 बिलियन डॉलर) हो गया।
रतन टाटा एक सफल उद्योगपति ही नहीं थे, वे समाज के कल्याण पर भी उतना ही ध्यान देते थे। रतन टाटा ने स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण सहित एनिमल वेलफेयर के पहलों पर ध्यान केंद्रित करते हुए परोपकारी कार्यों के लिए दान करते थे। उनके द्वारा कुल दान की गई राशि 1.2 बिलियन डॉलर (लगभग 9,000 करोड़ रुपये) से अधिक का दान किया है। वे एनिमल वेलफेयर के लिए बहुत कुछ करते थे। उन्होंने मुंबई में पशुओं के लिए सभी आधुनिक सुविधाओं वाले एक अस्पातल का निर्माण करवाया, जिसकी लागत 165 करोड़ रुपये थी, जो उनके पशुओं के प्रति केयर और प्रेम को दर्शाता है।
रतन टाटा भारत के सबसे प्रसिद्ध उद्योगपतियों और परोपकारी लोगों में से एक थे। 2024 तक रतन टाटा की अनुमानित कुल संपत्ति 3,800 करोड़ रुपये है। उनकी कुल संपत्ति का बड़ा हिस्सा टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के माध्यम से आता है, और इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा धर्मार्थ ट्रस्टों को दान किया जाता है, जो उनके उदार स्वभाव को भी दर्शाता है। टाटा संस के पूर्व अध्यक्ष के रूप में उनका वार्षिक पारिश्रमिक 2.5 करोड़ रुपये या लगभग 300,000 डॉलर वार्षिक बताया जाता है। यह उद्योग के अन्य शीर्ष अधिकारियों की तुलना में अपेक्षाकृत मामूली है। उनकी आय में टाटा संस में उनकी छोटी व्यक्तिगत हिस्सेदारी से मिलने वाला लाभांश भी शामिल है। उनके पास कई अन्य संपत्तियां भी हैं, लेकिन सबसे प्रमुख है मुंबई के कोलाबा में उनका समुद्र के सामने वाला बंगला, जिसकी कीमत 150 करोड़ रुपये से अधिक है। इसके अलावा कुछ कारें जो उनके कलेक्शन में थी जो उनके ऑटोमोबाइल जुनून को दर्शाती हैं। उनकी मनपसंद कारों में टाटा नैनो भी थी यह उनके दिल के करीब मानी जाती है। हाल ही में मुंबई के ताज होटल में रतन टाटा एक कार्यक्रम के दौरान टाटा नैनो से आए थे। इसके अलावा टाटा नेक्सन, मर्सिडीज-बेंज SL500, लैंड रोवर फ्रीलैंडर,मासेराटी क्वाट्रोपोर्टे, शेवरले कार्वेट, होंडा सिविक और कैडिलैक XLR उनके संग्रह का हिस्सा रही।
रतन टाटा जो कि देश के ही नहीं विश्व के सबसे बड़े उद्योगपति रहे। अकेल टाटा का दूसरी सबसे बड़ी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) है, जिसकी मार्केट वैल्यू 170 बिलियन डॉलर की है। हालांकि, उनका नाम दुनिया के अरबपतियों की सूची में कभी शामिल नहीं रहा। उसकी बड़ी वजह यह है कि रतन टाटा समेत पूरे टाटा परिवार ने अपनी कंपनियों के शेयरों का बड़ा हिस्सा कभी अपने पास नहीं रखा। इसके बजाए परिवार समूह से अपनी आमदनी को टाटा ट्रस्ट्स में निवेश कर देता है। ये ट्रस्ट्स शिक्षा, स्वास्थ्य, और ग्रामीण विकास जैसे कार्यों पर पैसा खर्च करते हैं। टाटा संस का लगभग 66 प्रतिशत मुनाफा चैरिटेबल ट्रस्ट्स को जाता है। रतन टाटा के पास खुद भी टाटा संस के बहुत मामूली शेयर ही थे।