भारत की तिमाही जीडीपी के आंकड़ों को शुक्रवार को जारी किया गया है। वित्त वर्ष की पहली तिमाही के लिए जारी आंकड़ों के मुताबिक इस बार विकास दर पांच फीसदी है, जो साढ़े छह सालों के सबसे निचले स्तर पर है। जीडीपी के आंकड़ों से न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बल्कि आम इंसान पर भी इसका असर पड़ता है। जीडीपी को हम सकल घरेलू उत्पाद दर के नाम से भी जानते हैं। हालांकि आम आदमी को आसानी से समझ में नहीं आता है कि इसकी गणना कैसे होती है और क्या इसके फायदे अथवा नुकसान होते हैं।
जीडीपी से एक राष्ट्र ही नहीं बल्कि एक व्यक्ति के जीवन पर भी असर पड़ता है। भारत में कृषि, उद्योग और सर्विसेज़ यानी सेवा तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर होती है। जीडीपी की दर और उत्पादन का मूल्य एक आधार वर्ष में उत्पादन की कीमत पर तय होता है। मसलन अगर आधार वर्ष 2010 है तो उसके आधार पर ही उत्पादन का मूल्य में बढ़त या गिरावट देखी जाती है।
जीडीपी की गणना करने का एक तरीका है। यह तरीका पूरे विश्व में एक ही है।
GDP (सकल घरेलू उत्पाद) = उपभोग + सकल निवेश + सरकारी खर्च + (निर्यात - आयात)। अंग्रेजी में इसको GDP = C + I + G + (X − M) कहते हैं जिसमें C (उपभोग), I (निवेश), G (सरकारी व्यय) और X − M (शुद्ध निर्यात) होता है।
केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) देशभर से उत्पादन और सेवाओं के आंकड़े जुटाता है इस प्रक्रिया में कई सूचकांक शामिल होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई हैं।
सीएसओ विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों से समन्वय स्थापित कर आंकड़े एकत्र करता है। मसलन, थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई की गणना के लिए मैन्युफैक्चरिंग, कृषि उत्पाद के आंकड़े उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय जुटाता है।