भारत में बिजली उत्पादन में जीवाश्म ईंधन का प्रभुत्व दशक के अंत तक समाप्त हो जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में यह दावा किया है। रिपोर्ट कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर बिजली उत्पादन में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत के पार जाने की उम्मीद है। रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षों में ऊर्जा संक्रमण में तेजी आई है। इसके अलावे, स्वच्छ प्रौद्योगिकी की तैनाती और पूंजी निवेश की गति रिकॉर्ड स्तर पर पहुच गई है।
आरबीआई ने कहा, "जीवाश्म ईंधन के प्रभुत्व का युग समाप्त हो रहा है, और इस दशक के अंत तक वैश्विक स्तर पर बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत को पार कर जाने की उम्मीद है।" रिपोर्ट के अनुसार स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि से स्टीलमेकिंग और एविएशन जैसे क्षेत्रों को मदद मिलेगी, जहां कम कार्बन उत्सर्जन का विकल्प अब भी अपने प्रारंभिक चरण में है। केंद्रीय बैंक ने कम कार्बन उत्सर्जन वाले ऊर्जा में निवेश बढ़ाने के महत्व पर भी प्रकाश डाला।
आरबीआई ने कहा, "स्वच्छ विद्युत उत्पादन से आक्रामक काबर्न उत्सर्जन की कटौती को बढ़ावा मिल सकता है, इसकी तत्काल जरूरत है। इससे इस्पात निर्माण और विमानन जैसे क्षेत्रों से निपटने के लिए अधिक समय मिल सकेगा, जहां कार्बन उत्सर्जन में कटौती करना फिलहाल चुनौती है।"
रिपोर्ट में बताया गया है कि जीवाश्म ईंधन में निवेश किए गए प्रत्येक डॉलर के लिए, आने वाले वर्षों में अक्षय ऊर्जा के लिए औसतन तीन डॉलर आवंटित किए जाने की आवश्यकता है, जो वर्तमान अनुपात से काफी अधिक है, जहां दोनों क्षेत्रों में समान निवेश हो रहा है। 2030 तक अक्षय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करना शताब्दी के मध्य तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जरूरी माना जाता है।
आरबीआई ने कहा, "ऊर्जा आपूर्ति पक्ष पर, जीवाश्म ईंधन पर खर्च होने वाले प्रत्येक अमेरिकी डॉलर के लिए, शेष दशक में औसतन 3 अमेरिकी डॉलर का निवेश निम्न-कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा में किया जाना चाहिए।" रिपोर्ट में आरबीआई ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि 2050 तक पूरी तरह से कार्बन मुक्त वैश्विक ऊर्जा प्रणाली की अनुमानित लागत 215 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होगी।
हालांकि, रिपोर्ट वित्तीय क्षेत्र को हरित बनाने के लिए चल रहे प्रयासों के बारे में आशावादी बनी हुई है। इसमें इस बात पर बल दिया गया है कि सार्वजनिक नीति हस्तक्षेप और बाजार आधारित प्रतिस्पर्धा के बीच सही संतुलन बनाना इस महत्वाकांक्षी ऊर्जा परिवर्तन की उपलब्धि को प्राप्त करने की दिशा में कुंजी साबित होगी। केंद्रीय बैंक ने यह भी कहा कि वित्तीय समावेशन में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है क्योंकि दुनिया भविष्य में अधिक टिकाऊ ऊर्जा की ओर आगे बढ़ रही है।