1600 के दशक में अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए थे, साल 1613 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बादशाह जहांगीर की इजाजत से पहला कारखाना सूरत में खोला। तब तक अंग्रेजो का भारतीय शासन में कोई दखल नहीं था लेकिन 1750 के दशक में अंग्रेजों ने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरु कर दिया और सन् 1757 में प्लासी का युद्ध जीतने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में भारतीय शासन के अधिकार आना भी शुरु हो गए।
जब अंग्रेजों ने प्लासी की लड़ाई जीत ली तब इसके बाद बंगाल के नवाब के साथ एक संधि की गई जिसके बाद अंग्रेजों को सिक्के बनाने का अधिकार मिल गया। इसके बाद कंपनी ने सबसे पहले कोलकाता में टकसाल की नींव रखी। सन 1757 में एक पुराने किले के भवन में यह टकसाल स्थापित की गई। 19 अगस्त 1757 में पहली बार एक रुपए का सिक्का जारी किया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इससे पहले सूरत, बॉम्बे और अहमदाबाद में भी टकसाल की स्थापना की थी लेकिन एक रुपए का पहला सिक्का कोलकाता की टकसाल से ही निकला था।
सूरत में सबसे पहली टकसाल स्थापित हुई थी लेकिन मांग के अनुसार सिक्के न बन पाने के कारण 1636 में अहमदाबाद में टकसाल शुरु की गई। इसके बाद सन 1672 में बॉम्बे में भी टकसाल की स्थापना की गई। बंगाल, मद्रास और बॉम्बे टकसाल में अलग-अलग सिक्के चल में थे। जिसके कारण पूरे देश में अलग-अलग सिक्के प्रचलन में होने की वजह से व्यापार में दिक्कतें आती थी। व्यापार में आने वाली दिक्कतों को देखते हुए सन 1835 में यूनिफॉर्म कॉइनेज एक्ट पारित किया गया जिसके बाद सभी में एक जैसे सिक्के जारी किए जाने लगे।
भारत में एक रुपए के सिक्के का चलन
उस समय चलने वाले सिक्कों के अग्र भाग में ब्रिटिश शासको या महारानियों के चित्र उत्कीर्ण होते थे। इनमें से महारानी बिक्टोरिया का चित्र सबसे प्रमुख था। सन 1947 में देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिलने के बाद भी ब्रिटिश काल के सिक्कों का चल भारत में 1950 तक रहा। भारत का पहला सिक्का सन् 1950 में ढाला गया। इसके बाद 1962 में एक रुपए का सिक्का चलन में आया जो आज तक बाजारों में चल रहा है।