इस दवा में एक पेड़ की छाल थी जिसे लौंग, गुलाब के पत्तों और कुछ अन्य सूखे पौधों के साथ पीसकर बनाया गया था। काउंटेस जल्द ही ठीक हो गईं। जिस करिश्माई पेड़ ने उनको ठीक किया था, उसे 'सिनकोना' नाम दिया गया। आज यह पेरू और इक्वेडोर का राष्ट्रीय पेड़ है। ज्यादातर इतिहासकार इस कहानी को गलत बताते हैं, मगर इसमें कुछ हद तक सच्चाई है।
कुनैन एक क्षारीय यौगिक है जो सिनकोना की छाल में पाया जाता है। यह मलेरिया फैलाने वाले परजीवियों को मार सकता है, लेकिन इसकी खोज स्पेन के जेसुइट पुजारियों ने नहीं की थी। कैनेल्स कहती हैं, 'स्पेन के लोगों के आने से पहले ही क्वेचुआ, केनरी और चिमु आदिवासियों को कुनैन के बारे में मालूम था। उन्होंने ही स्पेनिश जेसुइट को छाल के बारे में बताया था।'
ये तीनों आदिवासी समूह आज के समय के पेरू, बोलीविया और इक्वेडोर में रहते हैं। जेसुइट पुजारियों ने सिनकोना की दालचीनी जैसी छाल को पीसकर पाउडर बनाया, जिसे आसानी से पचाया जा सकता था। इसे 'जेसुइट पाउडर' कहा गया। कुछ ही दिनों में मलेरिया का इलाज करने वाली 'जादुई' दवा के बारे में यूरोप में चर्चा शुरू हो गई।
कुनैन का व्यापार
1640 के दशक तक जेसुइट ने सिनकोना की छाल को पूरे यूरोप तक पहुंचाने के लिए व्यापारिक मार्ग बना दिए। फ्रांस में, कुनैन से राजा लुई चौदहवें के बुखार का इलाज किया गया। रोम में, पोप के निजी चिकित्सकों ने पाउडर की जांच की और जेसुइट पुजारियों ने इसे लोगों में मुफ्त बांटा, लेकिन प्रोटेस्टेंट इंग्लैंड में इस दवा को शक की नजर से देखा गया। कुछ डॉक्टरों ने इसे कैथोलिक साजिश और 'पोप का जहर' करार दिया। ओलिवर क्रॉमवेल की मौत मलेरिया की वजह से हुई। उन्होंने कथित तौर पर 'जेसुइट पाउडर' लेने से इंकार कर दिया था।
खैर, 1677 तक रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियंस ने सिनकोना की छाल को दवा की आधिकारिक सूची में शामिल कर लिया। इसके बाद पूरे इंग्लैंड के डॉक्टर इससे मरीजों का इलाज कर सकते थे। सिनकोना का जुनून बढ़ा तो यूरोपीयों ने स्थानीय लोगों को इसकी छाल लाने के काम में लगा दिया। वे वर्षा वन के अंदर जाकर पेड़ की छाल उतारते थे और पेरू के बंदरगाहों पर खड़े जहाजों तक पहुंचाते थे।
सिनकोना की मांग बढ़ी तो स्पेन ने एंडीज को 'दुनिया का दवा घर' घोषित कर दिया। जल्द ही सिनकोना के पेड़ दुर्लभ होने लगे। 19वीं सदी में विदेशी कॉलोनियों में तैनात यूरोपीय सैनिकों को मलेरिया का खतरा बढ़ा तो सिनकोना की कीमत बढ़ गई।
'मलेरियल सब्जेक्ट्स' के लेखक डॉक्टर रोहन देब रॉय के मुताबिक कुनैन की पर्याप्त आपूर्ति सामरिक जरूरत बन गई। देब रॉय कहते हैं, 'औपनिवेशिक युद्धों में शामिल यूरोपीय सैनिक अक्सर मलेरिया से मर जाते थे। कुनैन जैसी दवा उनको जिंदा रहने और युद्ध जीतने के काबिल बनाती थी।'
डच सैनिकों ने इंडोनेशिया में, फ्रांस ने अल्जीरिया में और अंग्रेजों ने भारत, जमैका और पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी अफ्रीका में इसका इस्तेमाल किया। 1848 से 1861 के बीच ब्रिटिश सरकार ने उपनिवेशों में तैनात सैनिकों के लिए सिनकोना की छाल के आयात पर सालाना 64 लाख पाउंड खर्च किए।
इसीलिए इतिहासकारों ने कुनैन को 'साम्राज्यवाद का औजार' कहा है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को आगे बढ़ाया। ज्यूरिख यूनिवर्सिटी में ट्रैवेल मेडिसिन की प्रोफेसर पेट्रिसिया स्लेगेनहाफ कहती हैं, 'जिस तरह आज सभी देश कोविड-19 वैक्सीन बनाने की होड़ में हैं, उसी तरह उस समय कुनैन के लिए भाग-दौड़ मची थी।'
सिनकोना की छाल के साथ उसके बीज की भी मांग बढ़ गई थी। देब रॉय कहते हैं, 'ब्रिटिश और डच अपने उपनिवेशों में सिनकोना के पेड़ लगाना चाहते थे ताकि दक्षिण अमेरिका पर उनकी निर्भरता कम हो जाए।' लेकिन सही बीज का चुनाव करना आसान नहीं था। सिनकोना की 23 प्रजातियां थीं और उनमें कुनैन की मात्रा अलग-अलग थी। इस काम में स्वदेशी वनस्पति का ज्ञान रखने वाले स्थानीय आदिवासियों ने उनकी मदद की।
भारत में सिनकोना के पेड़
1850 के दशक में अंग्रेज दक्षिण भारत में सिनकोना के पेड़ लगाने में सफल रहे, जहां मलेरिया का प्रकोप बहुत ज्यादा था। ब्रिटिश अधिकारियों ने जल्द ही सैनिकों और सरकारी कर्मचारियों को स्थानीय तौर पर तैयार कुनैन देना शुरू कर दिया।
कहा जाता है कि उन्होंने कुनैन का स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें जिन मिला दिया। इस तरह पहले टॉनिक वाटर और जिन एंड टॉनिक ड्रिंक का आविष्कार हुआ। आज भी टॉनिक वाटर में कुनैन की थोड़ी सी मात्रा मिलती है, लेकिन 'जस्ट द टॉनिक' किताब की सह-लेखक किम वॉकर इस कहानी को मिथक मानती हैं। 'ऐसा लगता है कि उन्होंने इसमें वही मिलाया जो आसानी से उपलब्ध था- चाहे वह रम हो, ब्रांडी हो या अरक हो।'
स्लेगेनहाफ का कहना है कि शरीर में कुनैन की उम्र कम होती है, इसलिए जिन या टॉनिक के साथ इसे पीना मलेरिया से सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकती। इन सबके बावजूद मलेरिया की रोकथाम में जिन और टॉनिक का मिथक चलता रहा। विंस्टन चर्चिल ने कथित तौर पर कहा था, 'इस पेय ने जितने अंग्रेजों की जान बचाई है उतनी जानें साम्राज्य के सभी डॉक्टरों ने मिलकर भी नहीं बचाई।'
बेशक, जिन और टॉनिक फीवर ट्री से जुड़ा सिर्फ एक पेय है। आज पेरू में सबसे मशहूर कॉकटेल पिस्को साउर है, जिसे अमेरिकियों ने बनाया था। मगर पेरू के लोगों में सबसे लोकप्रिय है बिटर, जो कुनैन के स्वाद वाला पिस्को टॉनिक है। यह देसी खोज है जिसे अक्सर एंडीज के मेज मोराडो (बैंगनी मक्का) के साथ मिलाकर पिस्को मोराडो टॉनिक बनाया जाता है।
कैंपरी, पिम्स या फ्रेंच लिलेट (जेम्स बॉन्ड के मशहूर वेस्पर मार्टिनी का प्रमुख घटक) में भी कुनैन का स्वाद होता है। यह स्कॉटलैंड के इर्न-ब्रू और महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पसंदीदा पेय जिन एंड डबोनेट में भी मिलता है। जिन एंड डबोनेट दरअसल एक भूख बढ़ाने वाला पेय है, जिसे फ्रांस के केमिस्ट ने उत्तरी अमेरिका की कॉलोनियों में तैनात सैनिकों के लिए तैयार किया था।
1970 के दशक में आर्टेमिसिनिन की खोज होने के बाद कुनैन की मांग कम हो गई। फिर भी दुनिया भर में कुनैन की विरासत बची हुई है। इंडोनेशिया का बान-डुंग आज 'जावा का पेरिस' के रूप में जाना जाता है, क्योंकि डच ने इस बंदरगाह शहर को दुनिया के सबसे बड़े कुनैन केंद्र में बदल दिया था।
भारत, हांगकांग, सियरा लियोन, केन्या और श्रीलंका के तटीय क्षेत्रों में आज अंग्रेजी बड़े पैमाने पर बोली जाती है। इसी तरह मोरक्को, ट्यूनीशिया और अल्जीरिया में फ्रेंच बोली जाती है। इसकी एक वजह कुनैन भी है। स्पेनिश में आज भी एक कहावत चलती है 'ser más malo que la quina'- जिसका मोटे तौर पर मतलब है- कुनैन से भी कड़वा।
कुनैन से कमाई
1850 के दशक में जब दुनियाभर में कुनैन की होड़ चल रही थी, तब पेरू और बोलीविया दोनों ने सिनकोना की छाल के निर्यात पर एकाधिकार कर लिया था। असल में, ला पाज के अधिकर नियोक्लासिकल कैथेड्रल और प्लाजा से भरे शहर के एतिहासिक केंद्र में कॉबलस्टोन की सड़कें सिनकोना की छाल से हुई कमाई से ही बनी थीं। एक समय बोलीविया के कुल कर राजस्व में सिनकोना का हिस्सा 15 फीसदी था।
सदियों तक चलती रही सिनकोना छाल की मांग ने इसके जंगल उजाड़ दिए। 1805 में इक्वेडोर के एंडीज में 25 हजार सिनकोना पेड़ थे। अब उस जगह पोडोकार्पस नेशनल पार्क है, जहां सिनकोना के सिर्फ 29 पेड़ बचे हैं। कैनल्स का कहना है कि कुनैन से भरपूर प्रजातियों को एंडीज से हटाने के कारण सिनकोना के पेड़ों की आनुवांशिक संरचना बदल गई।
लंदन के रॉयल बोटैनिकल गार्डन के सहयोग से कैनल्स ने म्यूजियम में रखे पुराने सिनकोना छाल के नमूनों का अध्ययन किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि इंसान के कारण पेड़ों में क्या बदलाव हुए। वह कहती हैं, 'हमें लगता है कि अधिक दोहन होने से सिनकोना की छाल में कुनैन की मात्रा घट गई होगी।'
हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देकर कोरोना वायरस के संभावित इलाज के रूप में कुनैन के सिंथेटिक संस्करण हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के अध्ययन पर रोक लगा दी है। हालांकि यह दवा अब पेड़ों की छाल से नहीं, बल्कि प्रयोगशाला में बनाई जाती है, फिर भी कैनल्स का कहना है कि भविष्य में नई दवाओं की खोज के लिए सिनकोना और 'दुनिया के दवाघर' का संरक्षण जरूरी है।
सरकारें सिनकोना के संरक्षण के लिए कुछ नहीं कर रहीं, इसलिए कुछ स्थानीय संरक्षण समूहों ने यह काम शुरू किया है। 2021 में पेरू की आजादी के 200 साल पूरे होने पर सेमिला बेंडिटा नामक पर्यावरण संगठन ने 2,021 सिनकोना पेड़ लगाने की योजना बनाई है।
स्लेगेनहाफ को उम्मीद है कि एंडीज की जैव विविधता बचाने के और प्रयास भी होंगे। वह कहती हैं, 'कुनैन की कहानी बताती है कि जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य साथ-साथ चल सकते हैं। लोग पेड़ों को वैकल्पिक चिकित्सा के साधन समझते हैं, जबकि चिकित्सा इतिहास की कुछ प्रमुख दवाइयां हमें पेड़ों से ही मिली हैं।'