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क्या लिट्टी-चोखा की शुरुआत बिहार से ही हुई थी? जानिए इसके बारे में खास बातें

Fri, 21 Feb 2020 12:56 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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लिट्टी चोखा खाते हुए नरेंद्र मोदी - फोटो : PTI
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में दिल्ली में हुए 'हुनर हाट' कार्यक्रम में लिट्टी चोखा खाते नजर आए। इसके बाद सोशल मीडिया पर सोशल मीडिया पर लिट्टी चोखा को लेकर चर्चा होने लगी और ये कयास भी लगाए जाने लगे कि कहीं इसका संबंध बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से तो नहीं है। लिट्टी-चोखा को बिहार की सिग्नेचर डिश का दर्जा हासिल है। हालांकि डिश या व्यंजन आम तौर पर काफी पेचीदा होते हैं। उन्हें बनाने में काफी कारीगरी लगती है और ढेर सारी सामग्री भी। इस हिसाब से लिट्टी को व्यंजन नहीं कहा जा सकता। 
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लिट्टी-चोखा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
लिट्टी गूंथे हुए आटे की लोई का गोला है जिसे जलते अलाव में, कोयले या गोबर के उपले की आंच पर भून लिया जाता है। लोई की कुप्पी बनाकर उसके भीतर चने का भुरभुरा सत्तू भी भरा जाता है, लेकिन डोसे की ही तरह सादा लिट्टी और भरवां लिट्टी दोनों बनाए और खाए जाते हैं। चोखा आग पर पके हुए आलू, बैंगन और टमाटर जैसी सब्जियों का भुर्ता है। आग पर पकी सब्जियों को सीधे मसलकर उनमें नमक-तेल डाल दिया जाता है। कुल मिलाकर, यह दुनिया के सबसे आसानी से तैयार होने वाले खानों में है। इसे बनाने के लिए न तो ढेर सारे बर्तन चाहिए, न ही बहुत सारे मसाले और तेल, यहां तक कि पानी भी बहुत कम लगता है। 
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लिट्टी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
इसकी एक खासियत यह भी है कि यह कई दिनों तक खराब नहीं होता, लेकिन लोग इसे ताजा और गर्मागर्म खाना ही पसंद करते हैं। आम तौर पर सर्दी के दिनों में लोग अलाव सेंकते हुए घर के बाहर ही रात के खाने का इंतजाम भी कर लेते हैं। मोटे तौर पर लिट्टी बिहारी महिलाओं की रसोई का हिस्सा कम, और पुरुषों और यात्रियों का साथी अधिक रहा है। लिट्टी-चोखा ऐसी चीज है जिसे आप सुविधा और उपलब्ध सामग्री के हिसाब से जैसे चाहे वैसे बना सकते हैं। अगर घी है तो अच्छी बात है, अगर अचार और चटनी है तो और भी अच्छा है, अगर नहीं भी हैं, तो कोई बात नहीं। 

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लिट्टी-चोखा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
लिट्टी चोखा विशुद्ध रूप से आम आदमी या ये भी कह सकते हैं कि गरीब आदमी का भोजन है। पिछले कुछ सालों में बिहारी कामगारों के देशभर में फैलने के बाद धीरे-धीरे इसके ठेले बिहार से बाहर भी दिखाई देने लगे हैं। 1980 के दशक तक दिल्ली में लिट्टी-चोखा सड़क किनारे मिलना मुश्किल था, लेकिन अब यह दिखने लगा है। अगर सेहत के हिसाब से देखें तो यह तले हुए समोसे से तो बेहतर जरूर है। हालांकि घी में चुपड़ी लिट्टी की बात कुछ और है। 
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लिट्टी-चोखा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
सड़क किनारे सस्ते में मिलने वाला लिट्टी-चोखा अब गैर-बिहारी लोगों में भी धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रहा है। कुछ लोगों को इसमें लिपटी राख से सोंधी खुशबू आती है, इसकी देहाती और जमीन से जुड़े होने की अपनी एक अपील भी है। हालांकि कहीं-कहीं लिट्टी के नाम पर सत्तू भरा तला हुआ डो-बॉल (लोई का गोला) भी चलन में आ गया है, लेकिन वह नई ईजाद है, बिल्कुल फ्राइड मोमो की तरह। असली मोमो तो भाप में ही पकाया जाता है। अब लिट्टी को मटन और चिकन के साथ भी खाया जाने लगा है जो नया चलन है। 
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लिट्टी-चोखा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
बिहार एक बड़ा राज्य है लेकिन लिट्टी का चलन मिथिला में कम, मगध और भोजपुर क्षेत्र में अधिक दिखता है। माना जाता है कि लिट्टी चोखा का गढ़ मगध (गया, पटना और जहानाबाद वाला इलाका) है। चंद्रगुप्त मौर्य मगध के राजा थे, जिनकी राजधानी पाटलिपुत्र थी, लेकिन उनका साम्राज्य अफगानिस्तान तक फैला था। कुछ जानकारों का कहना है कि चंद्रगुप्त के सैनिक युद्ध के दौरान लंबे रास्तों में आसानी से लिट्टी जैसी चीज खाकर आगे बढ़ते जाते थे। हालांकि इसके ठोस एतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलते। 
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लिट्टी-चोखा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
18वीं सदी की कई किताबों में लंबी तीर्थयात्रा पर निकले लोगों का मुख्य भोजन लिट्टी-चोखा और खिचड़ी बताया गया है। हालांकि पक्के तौर पर एतिहासिक प्रमाणों के साथ नहीं कहा जा सकता कि लिट्टी की शुरूआत बिहार में ही हुई थी। आटे को आग पर सेंकने की कई विधियां देश भर में चलन में रही हैं जैसे मेवाड़ और मालवा की बाटी जिसे दाल के साथ खाया जाता है। 
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लिट्टी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
ऐसे उल्लेख भी मिलते हैं कि तात्या टोपे और झांसी की रानी के सैनिक बाटी या लिट्टी को पसंद करते थे, क्योंकि उन्हें पकाना बहुत आसान था और बहुत सामानों की जरूरत नहीं पड़ती थी। 1857 के विद्रोहियों के लिट्टी खाकर लड़ने के किस्से भी मिलते हैं। सदियों से बिहार के किसान खेत की पहरेदारी करते हुए वहीं लिट्टी बनाकर खा लिया करते थे, बहुत बाद में इसकी लोकप्रियता शहरों तक पहुंची। वैसे यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि चोखा के साथ उसकी जोड़ी बिहार में ही बनी। 
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