करण का पूरा शरीर जल गया सा लगता है, 10 साल का दुबला-पतला करण एक सफ़ेद सूती गमछा ओढ़े हुए है। उनके शरीर पर जगह-जगह मरहम लगी है। वो धीरे-धीरे चलकर घाट पर पहुंचे हैं।
दोपहर दो बजे की कड़ी धूप उनके शरीर पर क़हर बरपा रही है, वो नाव में अपने पिता के साथ बैठे हैं, लेकिन नाविक को नाव भरने का इंतज़ार है। करण के पिता रंजीत यादव बताते हैं, "छह महीने पहले उनके बेटे को यह अजीबोग़रीब बीमारी हो गई।" बेटे को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए हर बार उन्हें ऐसी तकलीफ़देह यात्रा से गुज़रना पड़ता है।
करण इस तकलीफ़देह यात्रा में अकेले नहीं है, राघोपुर दियारा को बाहरी दुनिया से सिर्फ़ नदी जोड़ती है। गंगा और गंडक नदी से घिरे राघोपुर में नदी पार करने के लिए पुल नहीं है।
वीआईपी क्षेत्र
वैशाली ज़िले के राघोपुर विधानसभा क्षेत्र को बिहार का वीआईपी क्षेत्र माना जाता है, यहां 15 साल तक लालू–राबड़ी का राज रहा। लेकिन 2010 में राबड़ी देवी, जेडीयू के सतीश यादव से 13 हज़ार वोटों से हार गईं थीं।
इस हार के बाद भी राघोपुर को राजद सुप्रीमो लालू यादव सुरक्षित मानते हैं, यही वजह है कि उन्होंने अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को राजनीति में राघोपुर से ही लांच किया। यादव बहुल राघोपुर वीआईपी क्षेत्र होने के बावजूद विकास के सभी मानकों में सबसे नीचे है।
सबसे बड़ा मुद्दा है पुल
राघोपुर दियारा के विकास कुमार कहते हैं, ''राघोपुर तो मिनी श्रीलंका है, यहां सबसे बड़ा मुद्दा पुल है। लोगों ने पिछली बार पुल के मुद्दे पर ही सतीश यादव को वोट दिया था, लेकिन पांच साल में वो पुल नहीं बनवा पाए।''
राघोपुर दियारा के जेठुली घाट पर आपको नाव पर टेम्पो, मिनी ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, कार, साइकिल सवार मिलेगी। विकास का आलम यह है कि दियारा में रसोई गैस तक की सप्लाई नहीं होती, रसोई गैस लाने के लिए भी नदी पार करनी पड़ती है।
दिसंबर से जून तक राघोपुर दियारा को पीपा पुल से जोड़ा जाता है, इन छह महीनों में ही राघोपुर में शादियां होती हैं, हालांकि पुल का शिलान्यास हो गया है।
लेकिन लोगों को भरोसा अब तक नहीं है। रामपुर के राजेंद्र राय कहते हैं, ''सतीश यादव काम तो किए हैं लेकिन हम लोग इतना ठगे गए हैं कि जब तक पुल पर चढ़ ना जाएं, तब तक मन नहीं मानेगा।''
हफ़्ते में एक दिन क्लास
सैदाबाद की मधुमाला हफ़्ते में सिर्फ़ एक दिन कॉलेज जाती हैं, इतिहास से स्नातक कर रही मधुमाला को पहले घाट, फिर नदी पार कर गंगा नदी पर बने महात्मा गांधी सेतु को पार करना पड़ता है।
वो कहती है, ''पांच घंटा लगता है एक क्लास करने में, रोज़ाना क्लास कैसे करें?'' राघोपुर दियारा में एक भी कॉलेज नहीं है। 12वीं तक की पढ़ाई के बाद बाहर जाकर पढ़ाई करना छात्रों की मजबूरी है, लेकिन आवागमन का साधन न होने से यह मुश्किल और बढ़ जाती है।
राघोपुर में रोज़गार का भी कोई साधन नहीं है, युवा राकेश कुमार कहते हैं, ''वोट मांगते वक़्त नेता सब ग़ज़ब-ग़ज़ब बाते करते हैं। ये कर देंगे, वो कर देंगें। लेकिन यहां सिर्फ़ खेती और दूध का काम है, कोई और काम यहां है कहां?''
हालांकि राघोपुर दियारा में खेती के हालात भी अच्छे नहीं हैं। बुंदेला कुमार राय कहते है, ''10 साल पहले तक यहां अरहर ख़ूब होता था, लेकिन नीलगाय ने सब ख़त्म कर दिया। किसानी बचानी है तो नीलगायों को ख़त्म करना होगा।''
'नहीं मालूम कमल का निशान'
राघोपुर दियारा के लोगों की बातों से नेताओं के ख़िलाफ़ नाराज़गी साफ़ नज़र आती है। डोमन राय कहते हैं, ''सब चाची, काकी, मामी कहकर वोट ले लेते हैं। एक बार वोट मिल गया, उसके बाद कोई फिकर नहीं।”
वहीं बुलेटिन यादव कहते हैं, ''पहली बार लालू जी आए तो सड़क बनवा दिए, बिजली ले आए। लेकिन उसके बाद उन्होंने कोई काम नहीं किया, ग़रीब-ग़ुरबे का नेता कोई नहीं है।''
इस बार बीजेपी के सतीश यादव और राजद के तेजस्वी यादव के बीच लड़ाई है, इस लड़ाई के एक दिलचस्प पहलू की ओर मोतीलाल संकेत करते हैं। वो कहते हैं, ''राघोपुर में कमल का निशान कभी लड़ाई में रहा ही नहीं। बीजेपी को वोटरों से ये निशान परिचित कराना ही सबसे मुश्किल काम होगा।''