बिहार में अगर किसी बात का डर है तो वह है भारतीय जनता पार्टी के 'आरजेडी करण' होने का। 'रोज़ाना जंगलराज का डर' कहते-कहते पार्टी जाने-अनजाने अपने आप को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के पुराने नेताओं से घिरी हुई पा रही है।
पार्टी के बिहार के 22 में से तीन सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद और भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव आरके सिंह भाजपा के केंद्रीय नेताओं के ख़िलाफ़ खुलकर बोल रहे हैं। वहीं नरेंद्र मोदी के समर्थन में सबसे ज़्यादा वो आगे आ रहे हैं जो कभी भाजपा को 'भारत जलाओ पार्टी' या दूसरे नामों से याद किया करते थे।
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पहली बार केंद्रीय मंत्री बनने वाले राम कृपाल यादव को फ़रवरी 2014 तक लालू प्रसाद यादव का हनुमान कहा जाता था और नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ की गई उनकी टिप्पणी सबको मालूम है। वो आज प्रधानमंत्री के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार हैं।
दूसरी तरफ़, पार्टी के बहुत पुराने सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री हुकुम देव नारायण यादव को तो कोई याद भी नहीं करता है। अगर आजकल सबसे अधिक पूछ है तो आरजेडी से निकाले गए मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव की, क्योंकि वो राजग में जाने के लिए सारी रेखाएं पार करने को तैयार हैं।
बीते फ़रवरी में प्रधानमंत्री से मिलने के बाद तो उनका सुर ऐसा बदला कि वो नीतीश की सरकार को गुंडों की सरकार तक कह रहे हैं।
पप्पू यादव भी रंगे भाजपा के रंग में
अब तक उन्होंने नरेंद्र मोदी के साथ न तो गया (9 अगस्त) में और न मुजफ़्फ़रपुर (25 जुलाई) की रैली में मंच साझा किया, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें वाई श्रेणी की सुरक्षा ज़रूर दे दी है।
आठ अगस्त को दिल्ली में कथित रूप से पप्पू के कुछ समर्थकों ने नीतीश कुमार के बिहार फ़ाउंडेशन के कार्यक्रम में बाधा डाली थी। इधर कुछ दिनों में वो अपने पुराने नेता लालू प्रसाद यादव को कई बार बुरा भला कह चुके हैं।
वो एनडीए में ना रह कर भी उसका पूरा काम कर रहे हैं। हालांकि उनकी पत्नी रंजीत रंजन अभी भी कांग्रेस की सांसद हैं।
याद रहे कि फ़रवरी 2008 में एक निचली अदालत ने पप्पू यादव को सीपीआई (एम) के विधायक अजित सरकार की हत्या का दोषी पाया था और उन्हें उम्र क़ैद की सज़ा हुई थी। बाद में 18 मई 2013 को उन्हें पटना हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था, उन पर कई और मुक़दमे भी हैं।
हाल ही में विमान में सफ़र के दौरान एक महिला कर्मचारी के साथ कथित तौर पर बदसलूकी के मामले में और बिहार के डॉक्टरों को फ़ीस नहीं घटाने पर धमकी देने के आरोप में पप्पू काफ़ी सुर्खियों में रहे।
जीतनराम मांझी भी चले मोदी के साथ
दूसरी तरफ़, अपने नौ महीने के मुख्यमंत्री कार्यकाल में एक बार 'डॉक्टरों के हाथ काटने' जैसी धमकी देने वाले जीतनराम मांझी आजकल नरेंद्र मोदी के साथ ख़ूब दिख रहे हैं। मुजफ़्फ़रपुर और अपने गृह इलाक़े गया की रैली में मांझी ने उनकी ख़ूब आवभगत की।
यह अलग बात है कि जब वो मुख्यमंत्री थे तो भाजपा के नेता सुशील कुमार मोदी ने उन्हें जेल भेजने की भी मांग कर डाली थी। वो कभी कांग्रेस में थे, लेकिन 1990 में लालू प्रसाद के सत्ता में आने के बाद उनके साथ आ गए। बाद में वो नीतीश कुमार की पार्टी (जदयू) में शामिल हो गए।
पासवान भी मुरीद
उन्हीं की तरह दूसरे दलित नेता और लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष राम विलास पासवान केंद्र सरकार के क़सीदे पढ़ रहे हैं। हालांकि भाजपा को भारत जलाओ पार्टी कहने वाले वही हैं। वो ये बात पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ़ को भी कहने से नहीं चूके थे।
राम विलास पासवान ही वो केंद्रीय मंत्री हैं जिन्होंने गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी सरकार से त्यागपत्र दिया था।
आरके सिंह और शत्रुघ्न सिन्हा बगावती मूड में
उपेंद्र कुश्वाहा
राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुश्वाहा भी उसी जमात में हैं। वो भी भाजपा के पुराने प्रदेश नेताओं से ज़्यादा नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं।
शत्रुघ्न सिन्हा और आरके सिंह
दूसरी तरफ़ शत्रुघ्न सिन्हा तो मुजफ़्फ़रपुर के रैली के कुछ घंटे बाद ही नीतीश कुमार से मिलने चले गए और चर्चा ये भी है कि उनकी पत्नी पूनम सिन्हा जेडीयू से विधायक का चुनाव भी लड़ सकती हैं। कीर्ति आज़ाद तो ललित मोदी मामले में अरुण जेटली के ख़िलाफ़ और आरके सिंह सुषमा स्वराज के विरोध में खुलकर सामने आ गए थे।
आरके सिंह ने तो पिछले सप्ताह संसद में कश्मीर में केंद्र सरकार की बेबसी का खुलकर मज़ाक़ उड़ाया। उन्होंने पूछा था कि पाकिस्तानी झंडा फहराने वालों के ख़िलाफ़ केंद्र सरकार क्यों कार्रवाई नहीं करती, जबकि पहले ऐसा किया जाता था।
ध्यान रहे कि आरके सिंह वही ज़िला मजिस्ट्रेट हैं जिन्होंने 23 अक्तूबर 1990 को समस्तीपुर में लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ़्तार किया था। बाद में केंद्र में जाने से पहले वो नीतीश सरकार में भी कुछ अच्छे ओहदों पर काम कर चुके हैं।