मृतक को 'सिर्फ सवारी' नहीं बल्कि मजदूर माना हाईकोर्ट ने
जस्टिस भास्कर राज प्रधान ने अपने फैसले में कहा कि मृतक महज एक यात्री नहीं था, बल्कि वह बीमा पॉलिसी के तहत कवर होने वाला एक मजदूर था। इसलिए यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को यह मुआवजा देना होगा।
मृतक के माता-पिता ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत ट्रिब्यूनल के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। ट्रिब्यूनल ने पहले यह कहकर मुआवजे का दावा खारिज कर दिया था कि मृतक ने बस लिफ्ट ली थी और वह बीमा पॉलिसी के दायरे में नहीं आता।
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हादसे के वक्त क्या हुआ था
यह हादसा 20 अप्रैल 2023 को हुआ था, जब मृतक पूर्वी सिक्किम के रोथांग से बोरिंग जाते समय वाहन में सफर कर रहा था। हाईकोर्ट ने पाया कि मृतक को वाहन में पांच बोरी रेत उतारने के लिए दिहाड़ी मजदूर के तौर पर रखा गया था।
वाहन मालिक ने भी कोर्ट में माना कि मृतक छोटी-मोटी मदद करने वाला मजदूर था। और उसने अपने घर की नाली मरम्मत के लिए रेत उतारने के काम में मदद के लिए उसे साथ लिया था। कोर्ट ने इसे यह साबित करने के लिए पर्याप्त माना कि मृतक एक मजदूर था।
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कोर्ट ने बीमा कंपनी की दलील खारिज की
हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत "वर्कमैन" की परिभाषा में हेल्पर, क्लीनर और मोटर वाहन से जुड़े अन्य काम करने वाले लोग भी आते हैं। चूंकि वाहन मालिक ने मजदूरों के बीमा के लिए अतिरिक्त प्रीमियम भी चुका रखा था, इसलिए बीमा कवर मृतक पर भी लागू होता है।
इंश्योरेंस कंपनी ने अपने जांच अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर यह तर्क दिया था कि मृतक तो ड्राइवर के गांव का था और मुफ्त में लिफ्ट ले रहा था, इसलिए वह बीमा दायरे में नहीं आता। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।
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लापरवाही से हुआ हादसा, मालिक भी जिम्मेदार
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि हादसा ड्राइवर की लापरवाही और लापरवाह ड्राइविंग की वजह से हुआ था। इसलिए वाहन मालिक पर भी अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदारी बनती है।
मुआवजा और ब्याज का आदेश
जस्टिस प्रधान ने अपने फैसले में कहा कि 21.89 लाख रुपये का मुआवजा उचित है। जिस पर दावा दायर करने की तारीख से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया जाएगा।
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