मंदिर या किसी भी पूजा स्थल में प्रवेश के बाद जो शांति या सकारात्मक ऊर्जा महसूस
होती है, उसका राज क्या है? ऐसा महसूस होता है कि जिस चिंता और तनाव से हम परेशान
थे उनसे निकलने का मार्ग मिल गया। मंदिर में प्रवेश करते ही ऐसा क्यों महसूस होता
है, अगर आप यह रहस्य नहीं समझ पाये हैं तो अगली बार जब भी मंदिर जाएं तो मंदिर की
छत को गौर से देखें। दरअसल मंदिर के छत की बनावट में आपको उर्जा प्रदान करने की
शक्ति होती है।
वास्तु विज्ञान के अनुसार गुंबदनुमा छत अथवा पिरामिड के नीचे
रहने से सकारात्मक उर्जा का संचार होता है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि उर्जा
विभिन्न दिशाओं में बंटती नहीं है। पिरामिड अथवा गुंबदनुमा छत की खोखली सतह से
टकराकर उर्जा सीधे व्यक्ति के ऊपर पड़ती है। यह परावर्तित उर्जा तरंगे मानव शरीर की
प्राकृतिक आवृति को बनाये रखने में सहायक होती है।
इससे ध्यान केन्द्रित
होता और ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ती है। यही कारण है कि प्राचीन काल में आमतौर पर
मंदिर की छत पिरामिडनुमा हुआ करती थी। ऋषिगण अपनी कुटिया की छत पिरामिडनुमा बनाते
थे, ताकि नकारात्मक उर्जा से उनकी तपस्या प्रभावित न हो। वास्तु विज्ञान में कहा
गया है कि पिरामिड नरात्मक उर्जा को सोख लेता है। बीमार व्यक्ति अगर पिरामिडनुमा
अथवा गुंबदनुमा छत के नीचे सोए तो इनके स्वास्थ्य तेजी से सुधार होता है।
वास्तु के इन्हीं नियमों को ध्यान में रखकर संभवतः मस्जिद और बौद्ध स्तूपों
की छत को गुंबदनुमा बनाया गया होगा। गिरिजाघरों की छत पिरामिडनुमा होती है इसके
पीछे भी वास्तु का यही नियम मान्य हो सकता है। पिरामिड वास्तु दोष दूर करने का एक
आसान साधन है। घर की छत पर पिरामिड बनाकर घर में मौजूद वास्तु दोष को दूर किया जा
सकता है।