हमदुल्लाह मोहिब के नजीबुल्लाह की कब्र पर जाने के पीछे कई संदेश हैं। तालिबान का अमेरिका के साथ अनुबंध फरवरी में खत्म हो रहा है जिसके तहत अमेरिका अपनी सेना को अफगानिस्तान से हटा लेगा लेकिन इससे देश में अनिश्चित हिंसा होने की संभावना है।
अफगानिस्तान के वरिष्ठ नेता मोहिब नजीबुल्लाह की कब्र पर इसलिए गए क्योंकि तालिबान ने ईद के दौरान तीन दिन के सीजफायर का एलान कर दिया था, ऐसा ही सीजफायर तालिबान ने 2018 में किया था लेकिन वो नहीं चल पाया था।
आखिरी सीजफायर यानी कि 26 मई को अफगानिस्तान की सरकार ने सैकड़ों तालिबानी मुजरिमों को रिहा कर दिया था। अपराधियों को छोड़ने का मतलब है कि कम से कम कुछ दिनों तक सीजफायर को रोका जा सकता है।
एक पश्तून नेता जिन्होंने मेडिकल की पढ़ाई करते हुए अपना करियर राजनीति में बनाया। नजीबुल्लाह कम्युनिस्ट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य रहे थे। सौर क्रांति के वक्त पीडीपीए ने 1978 में उनकी शक्ति छीन ली थी। 14 साल बाद ही नजीबुल्लाह ने कम्युनिस्ट पार्टी से अफगान नेशनलिस्ट पार्टी की ओर रुख किया।
1987 में नजीबुल्लाह देश के राष्ट्रपति बने और देश में शांति बहाल करने के लिए राष्ट्रीय समन्वय योजना (एनआरपी) की शुरुआत की। एनआरपी के तहत नजीबुल्लाह ने देश की प्री-कम्युनिस्ट ऑफ रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान का नाम बदल दिया, इस्लाम को देश का राष्ट्रधर्म बताया और पीडीपीए का नाम बदलकर हजब-ए-वतन कर दिया।
1992 में जैसे ही मुजाहिद्दीन ने अफगानिस्तान पर काबू किया, नजीबुल्लाह ने इस्तीफा दे दिया। भारत ने नजीबुल्लाह को वहां से निकालने की कोशिश की लेकिन ऐसा हो न सका। जिस कार में नजीबुल्लाह को लाया जा रहा था उसे एयरपोर्ट पर गार्ड्स ने रोक लिया।
नजीबुल्लाह को दिल्ली ले जाने वाला विमान रनवे पर खड़ा था लेकिन नजीबुल्लाह उन गार्ड से बहस करने लगे। जिसके बाद उन्हें अंदर एयरपोर्ट में ले जाना मुश्किल हो गया और वो वापस राष्ट्रपति भवन भी नहीं जा पाए। कार में उनको संयुक्त राष्ट्र के कंपाउंड मे ले जाया गया जहां उन्हें अगले साढ़े चार साल आत्म कारावास में रहने को कहा गया।
मुजाहिद्दीन के साथ चार साल के लंबे युद्ध के बाद तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया। 1996 में तालिबान ने काबुल को भी अपने कब्जे में लिया। नजीबुल्लाह, उनका भाई और उनके कुछ साथियों को संयुक्त राष्ट्र के भवन में ही रहना पड़ा।
संयुक्त राष्ट्र के भवन में जब कोई अधिकारी नहीं बचा तो तालिबान की एक छोटी सी टीम, जिसमें एक आईएसआई अधिकारी था, वहां आकर तबाही मचा दी। नजीबुल्लाह और उनके भाई को पीट, जीप के पीछे बांधकर खींचा, गोली मारी और राष्ट्रपति भवन के बाहर ट्रैफिक लाइट पर दोनों के शवों को लटका दिया गया।
ये काबुल और अफगानिस्तान के लोगों के लिए दिल दहलाने वाला संदेश था। इस घटना ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया और तालिबान के दोस्त माने जाने वाले सऊदी अरब ने भी इस घटना की निंदा की।
अफगानिस्तान के ज्यादातर लोग अमेरिका-तालिबान डील होने नहीं देना चाहते, उनको लगता है ऐसा करने से एक बार फिर अफगानिस्तान तालिबान के कब्जे में आ जाएगा। मोहिब तालिबान को पाकिस्तान का प्रतिनिधि ही मानते हैं।
मोहिब नजीबुल्लाह की कब्र पर इसलिए गए ताकि देश को ये संदेश दे सकें कि कैसे नजीबुल्लाह अफगानिस्तान को शांतिप्रिय देश बनाना चाहते थे और कैसे ये विफल हुआ। ये तालिबान की निर्दयता और कैसे उन्होंने खुद को अफगानिस्तान का शासक मान लिया, इसकी याद दिलाता है।
पाकिस्तान को भी सबक सिखाना है
नजीबुल्लाह ऐसे नेता थे जिन्होंने शक्तिशाली आईएसआई और उसके प्रमुख हामिद गुल के सपने को पूरा नहीं होने दिया था। हामिद गुल का प्रोजेक्ट था कि वो फरवरी 1989 में सोवियत सेना के जाने के एक महीने बाद ही काबुल पर मुजाहिद्दीन का शासन थोप दिया जाए।
लेकिन अफगानिस्तान की सेना ने मुजाहिद्दीन को बुरी तरह हराया। पांच महीने तक ये युद्ध चला जिसमें तीन हजार मुजाहिद्दीन मारे गए। उस समय बेनजीर भुट्टो ने हामिद गुल को निकाल दिया। पाकिस्तान के राजनैतिक जानकारी मोहम्मद तकी ने बताया कि कई लोग उनकी राष्ट्रीय समन्वय योजना का समर्थन करते हैं।
तकी ने बताया कि मोहिब का नजीबुल्लाह की कब्र पर जाना तालिबान विरोधी संदेश के साथ साथ अफगान के लोगों को सत्य और शांति के प्रति संदेश देना है।