डॉक्टर हिलेरी कॉपरोव्हस्की नाम के शख्स पर यह आरोप लगे कि उसने एचआईवी और इबोला पर अध्ययन करने के दौरान अफ्रीकी नागरिकों को संक्रमित किया। नकली पोलियो की वैक्सीन के बहाने डॉक्टर हिलेरी ने ऐसा किया। एक अनुमान के मुताबिक 1954 से 57 के बीच लाखों अफ्रीकियों को संक्रमित किया गया। हालांकि इस तथ्य का खंडन किया जाता रहा है। मगर साथ ही यह भी माना गया कि डब्ल्यूएचओ को शुरुआत से इस बारे में जानकारी थी।
इबोला पर आंख मूंदने का आरोप
पश्चिम अफ्रीका में 2014 के दौरान इबोला वायरस ने जानलेवा रूप धारण किया। इस दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ पर आंख मूंदने का आरोप लगा। लालफीताशाही, उचित आर्थिक मदद न करना और क्षेत्रीय ढांचे को लेकर इस वैश्विक संगठन की खूब आलोचना हुई।
अमेरिका और WHO के बीच आई दरार, अब ऐसे बढ़ सकती है चीन की अहमियत
डब्ल्यूएचओ के सहायक संगठन 'इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर' (IARC) पर गलत ढंग से शोध करने के आरोप लगे। इसके अलावा राजनीति से प्रेरित होने को लेकर भी संगठन की आलोचना हुई। ब्रिटेन के विज्ञान पत्रकार एड यंग ने एजेंसी की आलोचना करते हुए लोगों को गुमराह करने के आरोप भी लगाए।
IARC और मोबाइल फोन
IARC कैंसर संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने को लेकर भी कई बार विवाद उठा। उसने कैंसर के लिए संदिग्ध कारणों वाली क्लास 2ए या 2बी सूची में मोबाइल फोन, गर्म पेय पदार्थ और सैलून में काम करने जैसी चीजों को जोड़ दिया था।
इंग्लिश वेबसाइट 'द स्ट्रीट' के मुताबिक अक्तूबर 2017 में डब्ल्यूएचओ के तत्कालीन महासचिव ने एधानोम घेब्रेयसस ने जिम्बाव्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे को गैर संचारी बीमारी के खिलाफ अभियान का गुडविल अंबेसडर नियुक्त कर दिया। मानवाधिकारों को लेकर मुगाबे के खराब रिकॉर्ड को देखते हुए एजेंसी के इस कदम की काफी आलोचना हुई।