प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 75वें सत्र में हिंदी भाषा में संबोधित किया। उन्होंने अपने संबोधन में वैश्विक चुनौतियों के साथ भारत की उपलब्धियों को भी रेखांकित किया। प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले भी संयुक्त राष्ट्र में संबोधित कर चुके हैं। वह देश के लिए सम्मान और गौरव के क्षण थे। इससे पहले बीते वर्ष देश के सम्मान में उस समय और अधिक इजाफा हुआ था जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने ट्विटर पर हिंदी में अपना अकाउंट बनाया और हिंदी भाषा में ही पहला ट्वीट किया। पहले ट्वीट में लिखा संदेश पढ़कर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने फेसबुक पर भी हिंदी पेज बनाया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण दिया था। उस समय हमारा पूरा देश गौरवान्वित महसूस कर रहा था। लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा में सबसे पहले 1977 में हिंदी में भाषण दिया था अटल बिहारी बाजपेयी जी ने। उस वक्त वो जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री थे। उस समय वे संयुक्त राष्ट्र में भारत की अगुवाई कर रहे थे।
संयुक्त राष्ट्र में किसी भी भारतीय के पहले हिंदी भाषण का पूरे देश में जोरदार स्वागत हुआ था। उनके भाषण की जगह-जगह चर्चा होती थी। इसके बाद उन्होंने सन 2002 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में दोबारा इस अंतरराष्ट्रीय मंच से हिंदी में अपनी बात रखी थी। सितंबर 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित किया था।
क्या आप जानते हैं कि 1977 में अटलजी ने अपने भाषण में क्या कहा था। यहां पढ़िये उनका शब्दशः भाषण...
सरकार की बागडोर संभाले केवल छ: महीने हुए हैं। फिर भी इतने कम समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं। भारत में मूलभूत मानवाधिकार पुन: प्रतिष्ठित हो गए हैं। जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था वह अब खत्म हो गया है। ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं कि यह सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा।
अध्यक्ष महोदय, वसुधैव कुटुम्बकम की परिकल्पना बहुत पुरानी है। भारत में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है। अनेकानेक प्रयत्नों और कष्टों के बाद संयुक्त राष्ट्र के रूप में इस स्वप्न के साकार होने की संभावना है। यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा हूं। आम आमदी की प्रतिष्ठा और प्रगति मेरे लिए कहीं अधिक महत्व रखती है।
अंतत: हमारी सफलताएं और असफलताएं केवल एक ही मापदंड से मापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज, वस्तुत: हर नर, नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वस्ति देने में प्रयत्नशील हैं। अफ्रीका में चुनौती स्पष्ट है प्रश्न ये है कि किसी जनता को स्वतंत्रता और सम्मान के साथ रहने का अनपरणीय अधिकार है या रंगभेद में विश्वास रखने वाला अल्पमत और किसी विशाल बहुमत पर हमेशा अन्याय और दमन करता रहेगा। नि:संदेह रंगभेद के सभी रूपों का उन्मूलन होना चाहिए।
हाल में इजराइल ने वेस्ट बैंक को गाजा में नई बस्तियां बसाकर अधिकृत क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन करने का जो प्रयत्न किया है, संयुक्त राष्ट्र को उसे पूरी तरह अस्वीकार और रद्द कर देना चाहिए। यदि इन समस्याओं का संतोषजनक और शीघ्र ही समाधान नहीं होता इसके दुष्परिणाम इस क्षेत्र के बाहर भी फैल सकते हैं। यह अति आवश्यक है कि जेनेवा सम्मेलन का शीघ्र ही पुन: आयोजन किया जाए और उसमें पीएलओ को प्रतिनिधित्व दिया जाए। अध्यक्ष महोदय, भारत सब देशों से मैत्री चाहता है और किसी पर प्रभुत्व स्थापित नहीं करना चाहता।
भारत न तो आणविक शस्त्र शक्ति है और ना बनना चाहता है। नई सरकार ने अपने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुनर्घोषणा की है। हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्शी विषय जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों में बना रहेगा वह है मानव का भविष्य। मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव के कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे।
27 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संरा महासभा में दिया गया पूरा भाषण
विशिष्ट अतिथिगण और मित्रों
सर्वप्रथम मैं संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र के अध्यक्ष चुने जाने पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। भारत के प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार आप सबको संबोधित करना मेरे लिए अत्यंत सम्मान की बात है। मैं भारतवासियों की आशाओं एवं अपेक्षाओं से अभिभूत हूं। उसी प्रकार मुझे इस बात का पूरा भान है कि विश्व को 1.25 बिलियन लोगों से क्या अपेक्षाएं हैं। भारत वह देश है, जहां मानवता का छठवां हिस्सा आबाद है। भारत ऐसे व्यापक पैमाने पर आर्थिक व सामाजिक बदलाव से गुजर रहा है, जिसका उदाहरण इतिहास में दुर्लभ है।
प्रत्येक राष्ट्र की, विश्व की अवधारणा उसकी सभ्यता एवं धार्मिक परंपरा के आधार पर निरूपित होती है। भारत चिरंतन विवेक समस्त विश्व को एक कुटंब के रूप में देखता है। और जब मैं यह बात कहता हूं तो मैं यह साफ करता हूं कि हर देश की अपनी एक फिलॉसफी होती है। मैं आइडियोलॉजी के संबंध में नहीं कह रहा हूं। और देश उस फिलोस्फी की प्रेरणा से आगे बढ़ता है। भारत एक देश है, जिसकी वेदकाल से वसुधैव कुंटुम्बकम परंपरा रही है। भारत एक देश है, जहां प्रकृति के साथ संवाद, प्रकृति के साथ कभी संघर्ष नहीं ये भारत के जीवन का हिस्सा है और इसका कारण उस फिलॉसफी के तहत, भारत उस जीवन दर्शन के तहत, आगे बढ़ता रहता है। प्रत्येक राष्ट्र की, विश्व अवधारणा उसकी सभ्यता और उसकी दार्शनिक परंपरा के आधार पर निरूपित होती है। भारत का चिरंतन विवेक समस्त विश्व को, जैसा मैंने कहा - वसुधैव कुटुंबमकम - एक कुटुम्ब के रूप में देखता है। भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि विश्व पर्यंत न्याय, गरिमा, अवसर और समृद्धि के हक में आवाज उठाता रहा है। अपनी विचारधारा के कारण हमारा मल्टी लिट्रेलिस्म में दृढ़ विश्वास है।
आज यहां खड़े होकर मैं इस महासभा पर एक टिकी हुई आशाओं एवं अपेक्षाओं के प्रति पूर्णतया सजग हूं। जिस पवित्र विश्वास ने हमें एकजुट किया है, मैं उससे अत्यंत प्रभावित हूं। बड़े महान सिद्धांतों और दृष्टिकोण के आधार पर हमने इस संस्था की स्थापना की थी। इस विश्वास के आधार पर कि अगर हमारे भविष्य जुड़े हुए हैं तो शांति, सुरक्षा, मानवाधिकार और वैश्विक आर्थिक विकास के लिए हमें साथ मिल कर काम करना होगा। तब हम 51 देश थे और आज 193 देश के झंडे इस बिल्डिंग पर लहरा रहे हैं। हर नया देश इसी विश्वास और उम्मीद के आधार पर यहां प्रवेश करता है। हम पिछले 7 दशकों में बहुत कुछ हासिल कर सके हैं। कई लड़ाइयों को समाप्त किया है। शांति कायम रखी है। कई जगह आर्थिक विकास में मदद की है। गरीब बच्चों के भविष्य को बनाने में मदद दी है। भुखमरी हटाने में योगदान दिया है। और इस धरती को बचाने के लिए भी हम सब साथ मिल कर के जुटे हुए हैं।
69 संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशन में विश्व में ब्लू हेलमेट को शांति के एक रंग की एक पहचान दी है। आज समस्त विश्व में लोकतंत्र की एक लहर है।
अफगानिस्तान में शांतिपूर्वक राजनीतिक परिवर्तन यह भी दिखलाता है कि अफगान जनता की शांति की कामना हिंसा पर विजय अवश्य पाएगी। नेपाल युद्ध से शांति और लोकतंत्र की ओर आगे बढ़ा है। भूटान के नए लोकतंत्र में एक नई ताकत नजर आ रही है। पश्चिम एशिया एवं उत्तर अफ्रीका में लोकतंत्र के पक्ष में आवाज उठाए जाने के प्रयास हो रहे हैं। ट्यूनिशिया की सफलता दिखा रही है कि लोकतंत्र की ये यात्रा संभव है।
अफ्रीका में स्थिरता, शांति और प्रगति हेतु एक नई ऊर्जा एवं जागृति दिखायी दे रही है।
हमें एशिया और उसके पूरे अभूतपूर्व समृद्धि का अभ्युदय देखा है। जिसके आधार में शांति एवं स्थिरता की शक्ति समाहित है। अपार संभावनाओं से समृद्ध महादेश लैटिन अमेरिका स्थिरता एवं समृद्धि के साझा प्रयास में एकजुट हो रहा है। यह महादेश विश्व समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ सिद्ध हो सकता है।
भारत अपनी प्रगति के लिए एक शांतिपूर्ण एवं स्थिर अंतरराष्ट्रीय वातावरण की अपेक्षा करता है। हमारा भविष्य हमारे पड़ोस से जुड़ा हुआ है। इसी कारण मेरी सरकार ने पहले ही दिन से पड़ोसी देशों से मित्रता और सहयोग बढ़ाने पर पूरी प्राथमिकता दी है। और पाकिस्तान के प्रति भी मेरी यही नीति है। मैं पाकिस्तान से मित्रता और सहयोग बढ़ाने के लिए गंभीरता से शांतिपूर्ण वातवारण में बिना आतंक के साये के साथ द्विपक्षीय वार्ता करना चाहते हैं।लेकिन पाकिस्तान का भी यह दायित्व है कि उपयुक्त वातावरण बनाये और गंभीरता से द्विपक्षीय बातचीत के लिए सामने आये।
इसी मंच पर बात उठाने से समाधान के प्रयास कितने सफल होंगे, इस पर कइयों को शक है। आज हमें बाढ़ से पीडि़त कश्मीर में लोगों की सहायता देने पर ध्यान देना चाहिए, जो हमने भारत में बड़े पैमाने पर आयोजित किया है। इसके लिए सिर्फ भारत में कश्मीर, उसी का ख्याल रखने पर रूके नहीं हैं, हमने पाकिस्तान को भी कहा, क्योंकि उसके क्षेत्र में भी बाढ़ का असर था। हमने उनको कहा कि जिस प्रकार से हम कश्मीर में बाढ़ पीडि़तों की सेवा कर रहे हैं, हम पाकिस्तान में भी उन बाढ़ पीडि़तों की सेवा करने के लिए हमने सामने से प्रस्ताव रखा था।
हम विकासशील विश्व का हिस्सा हैं, लेकिन हम अपने सीमित संसाधनों को उन सभी के साथ साझा करने की छूट दें,जिन्हें इनकी नितांत आवश्यकता है।
दूसरी ओर आज विश्व बड़े स्तर के तनाव और उथल-पुथल की स्थितियों से गुजर रहा है। बड़े युद्ध नहीं हो रहे हैं, परंतु तनाव एवं संघर्ष भरपूर नजर आ रहा है, बहुतेरे हैं, शांति का अभाव है तथा भविष्य के प्रति अनिश्चितता है। आज भी व्यापक रूप से गरीबी फैली हुई है। एक होता हुआ एशिया प्रशांत क्षेत्र अभी भी समुद्र में अपनी सुरक्षा, जो कि इसके भविष्य के लिए आधारभूत महत्व रखती है, को लेकर बहुत चिंतित है।
यूरोप के सम्मुख नए वीजा विभाजन का खतरा मंडरा रहा है। पश्चिम एशिया में विभाजक रेखाएं और आतंकवाद बढ़ रहे हैं। हमारे अपने क्षेत्र में आतंकवादी स्थिरतावादी खतरे से जूझना जारी है। हम पिछले चार दशक से इस संकट को झेल रहे हैं। आतंकवाद चार नए नए रूप और नाम से प्रकट होता जा रहा है। इसके खतरे से छोटा या बड़ा, उत्तर में हो या दक्षिण में, पूरब में हो या पश्चिम में, कोई भी देश मुक्त नहीं है।
मुझे याद है, जब मैं 20 साल पहले विश्व के कुछ नेताओं से मिलता था और आतंकवाद की चर्चा करता था, तो उनके यह बात गले नहीं उतरती थी। वह कहते थे कि यह कानून और व्यवस्था की समस्या है। लेकिन आज धीरे धीरे आज पूरा विश्व देख रहा है कि आज आतंकवाद किस प्रकार के फैलाव को पाता चला जा रहा है। परंतु क्या हम वाकई इन ताकतों से निपटने के लिए सम्मिलित रूप से ठोस अंतरराष्ट्रीय प्रयास कर रहे हैं और मैं मानता हूं कि यह सवाल बहुत गंभीर है। आज भी कई देश आतंकवादियों को अपने क्षेत्र में पनाह दे रहे हैं और आतंकवादियों को अपनी नीति का उपकरण मानते हैं और जब अच्छा आतंकवाद और बुरा आतंकवाद, ये बातें सुनने को मिलती है, तब तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की हमारी निष्ठाओं पर भी सवालिया निशान खड़े होते हैं।
पश्चिम एशिया में आतंकवाद पाश्विकता की वापसी तथा दूर एवं पास के क्षेत्र पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए सम्मिलित कार्रवाई का स्वागत करते हैं। परंतु इसमें क्षेत्र के सभी देशों की भागीदारी और समर्थन अनिवार्य है। अगर हम आतंकवाद से लड़ना चाहते हैं तो क्यों न सबकी भागीदारी हो, क्यों न सबका साथ हो और क्यों न उस बात पर आग्रह भी किया जाए। समुद्र, अंतरिक्ष एवं साइबर स्पेस साझा समृद्धि के साथ-साथ संघर्ष के रंगमंच भी बने हैं। जो समुद्र हमें जोड़ता था, उसी समुद्र से आज टकराव की खबरें शुरू हो रही हैं। जो स्पेस हमारी सिद्धियों का एक अवसर बनता था, जो सायबर हमें जोड़ता था, आज इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नए संकट नजर आ रहे हैं।
उस अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की, जिसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई, जितनी आवश्यकता आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी। आज अब हम अन्योन्याश्रित संसार कहते हैं तो क्या हमारी आपसी एकता बढ़ी है। हमें सोचने की जरूरत है। क्या कारण है कि संयुक्त राष्ट्र जैसा इतना अच्छा प्लेटफार्म हमारे पास होने के बाद भी अनेक जी समूह बनाते चले गए हम। कभी जी4 होगा, कभी जी7 होगा, कभी जी20 होगा। हम बदलते रहते हैं और हम चाहें या न चाहें, हम भी उन समूहों में जुड़े हैं। भारत भी उसमें जुड़ा है।
लेकिन क्या आवश्यकता नहीं है कि हम जी1 से आगे बढ़ कर के जी-ऑल की तरफ कदम उठाएं। और जब संयुक्त राष्ट्र अपने 70 वर्ष मनाने जा रहा है, तब ये जी-ऑल का वातावरण कैसे बनेगा। फिर एक बार यही मंच हमारी समस्याओं के समाधान का अवसर कैसे बन सके। इसकी विश्वसनीयता कैसे बढ़े, इसका सामर्थ्य कैसे बढ़े, तभी जा कर के यहां हम संयुक्त बात करते हैं। लेकिन टुकड़ों में बिखर जाते हैं, उसमें हम बच सकते हैं, एक तरफ तो हम यह कहते हैं कि हमारी नीतियां परस्पर जुड़ी हुई हैं और दूसरी तरफ हम जीरो संघ के नजरिये से सोचते हैं। अगर उसे लाभ होता है तो मेरी हानि होती है, कौन किसके लाभ में है, कौन किसके हानि में है, यह भी मानदंड के आधार पर हम आगे बढ़ते हैं।
निराशावादी या आलोचनावादी की तरह कुछ भी नहीं बदलने वाला है। एक बहुत बड़ा वर्ग है, जिसके मन में है कि छोड़ो यार, कुछ नहीं बदलने वाला है, अब कुछ होने वाला नहीं है। ये जो निराशावादी और आलोचनावादी माहौल है, यह कहना आसान है। परंतु अगर हम ऐसा करते हैं तो हम अपनी जिम्मेदारियों से भागने का जोखिम उठा रहे हैं। हम अपने सामूहिक भविष्य को खतरे में डाल रहे हैं। आइए, हम अपने समय की मांग के अनुरूप अपने आप को ढालें। हम वक्त की शांति के लिए कार्य करें।
कोई एक देश या कुछ देशों का समूह विश्व की धारा को तय नहीं कर सकता है। वास्तविक अन्तरराज्यीय होना, यह समय की मांग है और यह अनिवार्य है। हमें देशों के बीच सार्थक संवाद एवं सहयोग सुनिश्चित करना है। हमारे प्रयासों का प्रारंभ यहीं संयुक्त राष्ट्र में होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार लाना, इसे अधिक जनतांत्रिक और भागीदारी परक बनाना हमारे लिए अनिवार्य है।
20वीं सदी की अनिवार्यताओं को प्रतिविदित करने वाली संस्थाएं 21वीं सदी में प्रभावी सिद्ध नहीं होंगी। इनके सम्मुख अप्रासंगिक होने का खतरा प्रस्तुत होगा, और भी आग्रह से कहना चाहता हूं कि पिछली शताब्दी के आवश्यकताओं के अनुसार जिन बातों पर हमने बल दिया, जिन नीति-नियमों का निर्धारण किया वह अभी प्रासंगिक नहीं है। 21वीं सदी में विश्व काफी बदल चुका है, बदल रहा है और बदलने की गति भी बड़ी तेज है। ऐसे समय यह अनिवार्य हो जाता है कि समय के साथ हम अपने आप को ढालें। हम परिवर्तन करें, हम नए विचारों पर बल दें। अगर ये हम कर पायेंगे तभी जाकर के हमारी प्रासंगिकता रहेगी। हमें अपने सभी मतभेदों को दरकिनार कर आतंकवाद से लड़ने के लिए सम्मिलित अंतरराष्ट्रीय प्रयास करना चाहिए।
मैं आपसे यह अनुरोध करता हूं कि इस प्रयास के प्रतीक के रूप में आप अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन को पारित करें। यह बहुत लंबे अरसे से लंबित चिह्न है। इस पर बल देने की आवश्यकता है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की हमारी ताकत का वो एक परिचायक होगा और इसे हमारा देश, जो आतंकवाद से इतने संकटों से गुजरा है, उसको समय लगता है कि जब तक वे इसमें पहल नहीं लेता है, और जब तक हम अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन को पारित नहीं करते हैं, हम वो विश्वास नहीं दिला सकते हैं। और इसलिए, फिर एक बार भारत की तरफ से इस सम्माननीय सभा के समक्ष बहुत आग्रहपूर्वक मैं अपनी बात बताना चाहता हूं। हमें बाह्य अंतरिक्ष और साइबर स्पेस में शांति, स्थिरता एवं व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। हमें मिलजुल कर काम करते हुए यह सुनिश्चित करना है कि सभी देश अंतरराष्ट्रीय नियमों, मानदंडों का पालन करें। हमें संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना के पुनित कार्यों को पूरी शक्ति प्रदान करनी चाहिए।
जो देश अपनी सैन्य टुकड़ियों का योगदान करते हैं, उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए। निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने से उनका हौसला बुलंद होगा। वो बहुत बड़ी मात्रा में त्याग करने को तैयार है; बलिदान देने को तैयार है, अपनी शक्ति और समय खर्च करने को तैयार हैं, लेकिन अगर हम उन्हें ही निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखेंगे तो कब तक हम संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना फोर्स को प्राणवान बना सकते हैं, ताकतवर बना सकते हैं। इस पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।
आइए, हर सार्वभौमिक वैश्विक रिसेसिकरण एवं प्रसार हेतू अपने प्रयासों में दोगुनी शक्ति लगाएं। अपेक्षाकृत अधिक स्थिर तथा समावेशी विकास हेतू निरंतर प्रयासरत रहें। वैश्विकरण ने विकास के नए ध्रुवों, नए उद्योगों और रोजगार के नए स्रोतों को जन्म दिया है। लेकिन साथ ही अरबों लोग गरीबी और अभाव के अर्द्धकगार पर जी रहे हैं। कई देश ऐेसे हैं, जो विश्वव्यापी आर्थिक तूफान के प्रभाव से बड़ी मुश्किल से बच पा रहे हैं। लेकिन इन सब में बदलाव लाना जितना मुमकिन आज लग रहा है, उतना पहले कभी नहीं लगता था।
तकनीक ने बहुत कुछ संभव कर दिखाया है। इसे मुहैया करने में होने वाले खर्च में भी काफी कमी आई है। यदि आप सारी दुनिया में फेसबुक और ट्विटर के प्रसार की गति के बारे में, सेलफोन के प्रसार की गति के बारे में सोचते हैं तो आपको यह विश्वास करना चाहिए कि विकास और सशक्तिकरण का प्रसार भी कितनी तेज गति से संभव है।
जाहिर है, प्रत्येक देश को अपने राष्ट्रीय उपाय करने होंगे, प्रगति व विकास को बल देने हेतु प्रत्येक सरकार को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। साथ ही हमारे लिए एक स्तर पर एक सार्थक अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी की आवश्यकता है, जिसका अर्थ हुआ, नीतियों को आप बेहतर समन्वय करें ताकि हमारे प्रयत्न, परस्पर संयोग को बढ़ावा दे तथा दूसरे को क्षति न पहुंचाये। ये उसकी पहली शर्त है कि दूसरे को क्षति न पहुंचाएं। इसका यह भी अर्थ है कि जब हम अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों की रचना करते हैं तो हमें एक दूसरे की चिंताओं व हितों का ध्यान रखना चाहिए।
जब हम विश्व के अभाव के स्तर के विषय में सोचते हैं, आज बुनियादी स्वच्छता 2.5 बिलियन लोगों के पहुंच के बाहर है। आज 1.3 बिलियन लोगों को बिजली उपलब्ध नहीं है और आज 1.1 बिलियन लोगों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं है। तब स्पष्ट होता है कि अधिक व्यापक व संगठित रूप से अंतरराष्ट्रीय कार्यवाही करने की प्रबल आवश्यकता है। हम केवल आर्थिक वृद्धि के लिए इंतजार नहीं कर सकते। भारत में मेरे विकास का एजेंडा के सबसे महत्वपूर्ण पहलू इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित हैं।
मैं यह मानता हूं कि हमें 2015 के बाद का विकास एजेंडा में इन्हीं बातों को केन्द्र में रखना चाहिए और उन पर ध्यान देना चाहिए। रहने लायक तथा टिकाऊ सतत विश्व की कामना के साथ हम काम करें। इन मुद्दों पर ढेर सारे विवाद एवं दस्तावेज उपलब्ध हैं। लेकिन हम अपने चारों ओर ऐसी कई चीजें देखते हैं, जिनके कारण हमें चिंतित व आगाह हो जाना चाहिए। ऐसी भी चीजें हैं जिन्हें देखने से हम चिंतित होते जा रहे हैं। जंगल, पशु-पक्षी, निर्मल नदियां, जज़ीरे और नीला आसमान।
मैं तीन बातें कहना चाहूंगा, पहली बात, हमें चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में ईमानदारी बरतनी चाहिए। विश्व समुदाय ने सामूहिक कार्यवाही के सुंदर संतुलन को स्वीकारा है, जिसका स्वरूप सामान्य व अलग-अलग जिम्मेदारियां। इसे सतत कार्यवाही का आधार बनाना होगा। इसका यह भी अर्थ है कि विकसित देशों को वित्त पोषण और तकनीक हस्तांतरण की अपनी प्रतिबद्धता को अवश्य पूरा करना चाहिए।
दूसरी बात, राष्ट्रीय कार्यवाही अनिवार्य है। टेक्नोलोजी ने बहुत कुछ संभव कर दिया है, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी। आवश्यकता है तो सृजनशीलता व प्रतिबद्धता की। भारत अपनी टेक्नोलोजी क्षमता को साझा करने के लिए तैयार है। जैसा कि हमने हाल ही में सार्क देशों के लिए एक नि:शुल्क उपग्रह बनाने की घोषणा की है।
तीसरी बात हमें अपनी जीवनशैली बदलने की आवश्यकता है। जिस ऊर्जा का उपयोग न हुआ हो, वह सबसे साफ ऊर्जा है। इससे आर्थिक नुकसान नहीं होगा। अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा मिलेगी।
हमारे भारतवर्ष में प्रकृति के प्रति आदरभाव अध्यात्म का अभिन्न अंग है। हम प्रकृति की देन को पवित्र मानते हैं और मैं आज एक और विषय पर भी ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि हम जलवायु परिवर्तन की बात करते हैं। हम होलिस्टिक हेल्थ केयर की बात करते हैं। जब हम मूल में वापसी की बात करते हैं तब मैं उस विषय पर विशेष रूप से आप से एक बात कहना चाहता हूं। योग हमारी पुरातन पारम्परिक अमूल्य देन है। योग मन व शरीर, विचार व कर्म, संयम व उपलब्धि की एकात्मकता का तथा मानव व प्रकृति के बीच सामंजस्य का मूर्त रूप है। यह स्वास्थ्य व कल्याण का समग्र दृष्टिकोण है। योग केवल व्यायाम भर न होकर अपने आप से तथा विश्व व प्रकृति के साथ तादम्य को प्राप्त करने का माध्यम है।
यह हमारी जीवन शैली में परिवर्तन लाकर तथा हम में जागरूकता उत्पन्न करके जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सहायक हो सकता है। आइए हम एक ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ को आरंभ करने की दिशा में कार्य करें। अंतत: हम सब एक ऐतिहासिक क्षण से गुजर रहे हैं। प्रत्येक युग अपनी विशेषताओं से परिभाषित होता है। प्रत्येक पीढी इस बात से याद की जाती है कि उसने अपनी चुनौतियों का किस प्रकार सामना किया। अब हमारे सम्मुख चुनौतियों के सामने खड़े होने की जिम्मेदारी है। अगले वर्ष हम 70 वर्ष के हो जाएंगे। हमें अपने आप से पूछना होगा कि क्या हम तब तक प्रतीक्षा करें तब हम 80 या 100 के हो जाएं। मैं मानता हूं कि संयुक्त राष्ट्र के लिए अगला साल एक अवसर है। जब हम 70 साल की यात्रा के बाद लेखाजोखा लें, कहां से निकले थे, क्यूं निकले थे, क्या मकसद था, क्या रास्ता था, कहां पहुंचे हैं, कहां पहुंचना है।
21 सदी के कौन से प्रकार हैं, कौन से चुनौतियां हैं, उन सबको ध्यान में रखते हुए पूरा एक साल व्यापक विचार मंथन हो। हम विश्वविद्यालयों को जोड़ें, नई पीढ़ी को जोड़ें जो हमारे कार्यकाल का विगत से मूल्यांकन करे, उसका अध्ययन करे और हमें वो भी अपने विचार दें। हम नई पीढ़ी को हमारी नई यात्रा के लिए कैसे जोड़ सकते हैं और इसलिए मैं कहता हूं कि 70 साल अपने आप में एक बहुत बड़ा अवसर है। इस अवसर का उपयोग करें और उसे उपयोग करके एक नई चेतना के साथ नई प्राणशक्ति के साथ, नए उमंग और उत्साह के साथ, आपस में एक नए विश्वास साथ हम संयुक्त राष्ट्र की यात्रा को हम नया रूप रंग दें। इस लिए मैं समझता हूं कि ये 70 वर्ष हमारे लिए बहुत बड़ा अवसर है।
आइए, हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार लाने के अपने वादे को निभाएं। यह बात लंबे अरसे से चल रही है लेकिन वादों को निभाने का सामर्थ्य हम खो चुके हैं। मैं आज फिर से आग्रह करता हूं कि आज इस विषय में गंभीरता से सोचें। आइए, हम अपने 2015 के बाद का विकास एजेंडा के लिए अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करें।
आइए 2015 को हम विश्व की प्रगति प्रवाह को एक नया मोड़ देने वाले एक वर्ष के रूप में हम अविस्मरणीय बनायें और 2015 एक नितांत नई यात्रा के प्रस्थान बिंदु के रूप में मानव इतिहास में दर्ज हो। यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। मुझे विश्वास है कि सामूहिक जिम्मेदारी को हम पूरी तरह निभाएंगे।
आप सबका बहुत बहुत आभार।
धन्यवाद। नमस्ते।
कैसे बना संयुक्त राष्ट्र
संयुक्त राष्ट्र संघ एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जिसके सदस्य दुनिया के कई देश हैं। यह विश्व की अद्वितीय संस्था है। 24 अक्तूबर 1945 इतिहास में दर्ज वह ऐतिहासिक दिन है जब संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी। शुरुआत में सिर्फ 50 राष्ट्र ही इसके सदस्य थे। लेकिन मौजूद समय में संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्य देशों की संख्या बढ़कर 193 हो गई है। अब इसे सिर्फ 'संयुक्त राष्ट्र' के नाम से जाना जाता है। संघ शब्द को महासभा के एक प्रस्ताव के तहत नाम से हटा दिया गया है। इसका मुख्यालय न्यूर्याक में है।
साल 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध और इससे पहले हुए प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुए विनाश को देखकर दुनिया के देश भयभीत हो चुके थे। इसलिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विजयी देशों ने इस संगठन की स्थापना हुई ताकि भविष्य में इस प्रकार के युद्धों को रोकने एवं शांति सुरक्षा बनाये रखने की दिशा में सार्थक कोशिश की जा सके।
क्या है यूएनजीए
- संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के प्रमुख छह अंगों में से एक है।
- यूएनजीए संयुक्त राष्ट्र की एकमात्र ऐसी संस्था है जहां सभी सदस्य देशों को समान प्रतिनिधित्व मिला हुआ है।
- यूएनजीए का पहला अधिवेशन 10 जनवरी 1946 को लंदन के मेथोडिस्ट सेंट्रल हॉल में हुआ था।
- 1946 में यूएनजीए में 51 सदस्य देश थे। वर्तमान में दुनिया भर के 193 देश यूएनजीए के सदस्य हैं।
- यूएनजीए में कुल सदस्य देशों के करीब दो तिहाई विकासशील देश (Developing Country) हैं।
- संख्या में ज्यादा होने के कारण विकासशील देश अक्सर यूएनजीए के अधिवेशनों के एजेंडे भी तय करने में सफल हो जाते हैं।
- अधिवेशन के हर सत्र के लिए एजेंडा करीब सात महीने पहले से ही तय कर लिए जाते हैं। फिर अधिवेशन से 60 दिन पहले इन्हें रिवाइज किया जाता है।
यूएनजीए को क्यों कहते हैं विश्व की लघु संसद?
- हर साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का अधिवेशन होता है।
- इन अधिवेशनों में सदस्य देशों के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हिस्सा लेते हैं। इन सभी के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा व बहस होती है, प्रस्ताव रखे जाते हैं।
- किसी प्रस्ताव को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। मतों के लिए एक देश, एक मताधिकार की प्रणाली लागू होती है। यानी एक देश से एक प्रतिनिधि अपना मत देते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र के बजट समेत कुछ अन्य क्षेत्रों में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार भी यूएनजीए के पास है। यहां ये भी तय होता है कि संस्था के कार्यों के लिए हर सदस्य देश को कितनी राशि देनी है।
- यूएनजीए के बजट को राजनीतिक मामलों, अंतरराष्ट्रीय न्यान व कानून के माममों, विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, जन सूचना, मानवाधिकार जैसे क्षेत्रों में संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रमों के लिए किया जाता है।
- इन कारणों से भी यूएनजीए को विश्व की लघु संसद कहा जाता है।