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इतिहास के पन्नों से : जब कराची के हवाईअड्डे पर राष्ट्रपति पर हुआ हमला, मच गई थी खलबली

Wed, 23 Jun 2021 07:03 PM IST
देवेश शर्मा एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

पाकिस्तान विदेशी मेहमानों के लिए भी सुरक्षित नहीं रहा। वहां इंटेलीजेंस एजेंसियों को भी यह पता नहीं चल पाता है कि कब कौन सिरफिरा किसकी हत्या कर दे या कत्लेआम मचा दे। भले ही वह किसी देश का राष्ट्रपति या अपने ही मुल्क के प्रधानमंत्री, किसी की सुरक्षा की गारंटी नहीं है। 
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1970 : कराची के हवाईअड्डे पर हमला - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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इतिहास के पन्नों को खंगालते हैं तो पता चलता है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी उग्रवाद इतना हावी है कि सरकार और सुरक्षा एजेंसियां भी बौनी साबित होती हैं। अपने स्थानीय शीर्ष नेताओं की तरह ही पाकिस्तान विदेशी मेहमानों के लिए भी सुरक्षित नहीं रहा।

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वहां इंटेलीजेंस एजेंसियों को भी यह पता नहीं चल पाता है कि कब कौन सिरफिरा किसकी हत्या कर दे या कत्लेआम मचा दे। भले ही वह किसी देश का राष्ट्रपति या अपने ही मुल्क के प्रधानमंत्री, किसी की सुरक्षा की गारंटी नहीं है। 
पाकिस्तान ऐसा मुल्क है जिसने कभी इतिहास की घटनाओं से सबक नहीं लिया। ऐसी एक घटना है नवंबर 1970 की, जो हुई तो पाकिस्तान में थी, मगर इसने पूरी दुनिया में हलचल पैदा कर दी थी। जिससे पाकिस्तान की खूब फजीहत भी हुई। आइए जानते हैं क्या है वह घटना और क्या उसका अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव और भारी सुरक्षा के बीच हवाईअड्डे पर किसके इशारे से हुआ था कत्लेआम। पढ़िए यहां ... 
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यह कहानी शुरू होती है कराची अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से। दिन था एक नवंबर, 1970 का, वक्त सुबह 11 बजे। रूस निर्मित विमान आईएल-18 ने कराची हवाईअड्डे पर लैंडिंग की। कुछ हाईप्रोफाइल विदेशी दंपती और उनके साथ आए मेहमान सीढ़ी के जरिये नीचे उतरे और हवाईअड्डे पर विमान के नजदीक लोगों से परिचय करने लगे। इस दौरान पाकिस्तान सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी और कराची के कई प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि भारी सुरक्षा इंतजाम के साथ मौजूद थे। विमान से थोड़ी ही दूर अन्य गणमान्य नागरिकों और मीडिया कर्मी भी वहां उपस्थित थे। वे उस विदेशी दंपती की आवभगत के साथ उनकी प्रतिक्रियाओं को नोट कर रहे थे। 

अचानक तेज गति से आई एक वैन और मच गई चीख-पुकार

इसी बीच, अचानक से पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस की एक कैटरिंग वैन उस वीआईपी विमान की ओर तेजी से बढ़ने लगी। यह वैन विमान के पीछे की ओर खड़ी थी लेकिन अचानक हुई इस हलचल से सब हक्के-बक्के थे। कोई कुछ समझ पाता इसके पहले ही तेज गति से आई वह वैन रिसेप्शन एरिया की ओर खड़े लोगों को बेरहमी से कुचलते हुए आगे बढ़ गई।

कई विदेशी मेहमान और मेजबान इस वैन की चपेट में आ गए थे। चारों तरह हाहाकार मच गया। चीख-पुकार और दर्द से कराहते घायलों के बीच, वहां मौजूद सुरक्षाबलों से उस वैन चालक को तो पकड़ लिया था, मगर उस दिन पाकिस्तान के माथे पर एक कलंक लग गया था। यह कलंक हाईप्रोफाइल विदेशी मेहमानों की सुरक्षा में बड़ी चूक का था। 

आखिर यह क्या हुआ और क्यों हुआ? 

आप सभी यह जानने को उत्सुक होंगे कि आखिर वह हाईप्रोफाइल विदेशी जोड़ा कौन थे? विदेशी मेहमान कहां से आए थे और वे कराची में क्या कर रहे थे? हमले में उनका क्या हुआ? हमले में किन-किन की मौत हुई और हमला क्यों किया गया था? तो पढ़िए आगे। 

इस हमले में पोलैंड के उप विदेश मंत्री जगफ्रेड वेलिनक, पाकिस्तान के सूचना विभाग के फोटोग्राफर अशरफ बेग, पाकिस्तान की सरकारी समाचार एजेंसी एपीपी के फोटो संपादक यासीन और इंटेलीजेंस ब्यूरो के अधिकारी चौधरी नजर अहमद आदि गंभीर रूप से घायल हुए थे। इस कारण उनकी मौत हो गई। वहीं, पोलैंड के काउंसिल जनरल और कराची के महापौर समेत एक दर्जन लोग घायल हुए थे। 

बाल-बाल बचे इस देश के राष्ट्रपति 

हालांकि, इस हमले में वह विदेशी जोड़ा बाल-बाल बच गया। यह हाईप्रोफाइल विदेशी जोड़ा कोई और नहीं बल्कि पोलैंड के राष्ट्रपति मैरियन स्पिखेल्स्की और पत्नी बारबरा इस्तिखार्स्की थीं। क्योंकि वे उस वक्त थोड़ी दूर थे इसलिए, सुरक्षित बच गए थे। पोलैंड के राष्ट्रपति मैरियन स्पिखेल्स्की की आधिकारिक यात्रा के दौरान हुए इस हमले से पाकिस्तान से लेकर पोलैंड की सुरक्षा एजेंसियां हरकत में आ गई थी।

आनन-फानन में राष्ट्रपति ने अपना पाकिस्तान दौर वहीं खत्म कर दिया। और कुछ ही घंटों बाद राष्ट्रपति ने पाकिस्तान से अपने साथी प्रतिनिधिमंडल के साथियों और उप विदेश मंत्री के पार्थिव शव के साथ पोलैंड के लिए उड़ान भरी। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका थी कि दूसरा हमला भी हो सकता है। जल्दी इतनी थी कि उप विदेश मंत्री के शव वाला ताबूत भी ठीक तरह बंद नहीं किया गया। 

पांच दिवसीय दौरे पर थे राष्ट्रपति 

दरअसल, 28 अक्तूबर 1970 को पोलैंड के राष्ट्रपति मैरियन स्पिखेल्स्की पांच दिवसीय यात्रा पर पाकिस्तान पहुंचे थे। उनके साथ उनकी पत्नी बारबरा इस्तिखार्स्की, उप विदेश मंत्री और उनकी पत्नी, एवं प्रतिनिधिमंडल में शामिल अन्य साथी थे। अपनी यात्रा के शुरुआती चार दिनों में उन्होंने पाकिस्तान के प्रमुख स्थलों का भ्रमण किया था। साथ ही पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या खान के साथ द्विपक्षीय मुलाकात के दौरान कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। 01 नवंबर का दिन उनकी यात्रा का आखिरी दिन था। वे वापसी यात्रा के लिए ही कराची हवाईअड्डे पर पहुंचे थे। 

हमले का कारण क्या था?
पोलैंड की राष्ट्रीय एजेंसी आईपीएन के लिए लिखे गए एक शोध पत्र में, शोधकर्ता पॉल मैगिंस्की ने उल्लेख किया कि उन दिनों पोलैंड सोवियत संघ के अधीन था और वहां कम्युनिस्ट शासन था। उधर, पाकिस्तान में अगले दो महीनों के बाद दिसंबर 1970 में आम चुनाव होने थे। पाकिस्तान की राजनीति में इस्लामी कट्टरपंथ और उग्रवाद का बोलबाला रहा है। लेकिन उन दिनों दुनियाभर में साम्यवादी समाजवाद की विचारधारा तेजी से बढ़ रही थी। 

कम्युनिज्म बनाम इस्लामीकरण की सरगर्मियां तेज थीं

पाकिस्तान के राजनीतिक दल पीपुल्स पार्टी के प्रमुख जुल्फिकार अली भुट्टो और आवामी लीग के प्रमुख शेख मुजीबुर रहमान भी इससे प्रेरित होने लगे थे। जबकि दूसरी ओर जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख, मुफ्ती महमूद और जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी पाकिस्तान में पूरी तरह इस्लामी व्यवस्था लागू करने के लिए रैलियां कर रहे थे। इस बीच, एक कम्युनिस्ट देश का राष्ट्रपति पहली बार पाकिस्तान के दौरे पर पहुंचा था। पाकिस्तान के मौलानाओं  ने कम्युनिज्म यानी साम्यवाद और समाजवादी व्यवस्था को काफिराना निजाम घोषित कर रखा था। 

कम्युनिस्ट शासन के प्रति नफरत का माहौल
पोलैंड की सुरक्षा एजेंसियों को भी इस बात की आहट थी कि पाकिस्तान में यात्रा को लेकर विरोध-प्रदर्शन हो सकते हैं। लेकिन इतना बड़ा हमला होगा यह अकल्पनीय था। पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथता और कम्युनिज्म के प्रति बढ़ती नफरत इससे साफ जाहिर हो रही थी। हालांकि, सुरक्षा एजेंसियों की चिंता इसलिए कम हो चुकी थी, दौरे के शुरुआती चार दिन अच्छे से गुजरे हैं और कोई अराजक घटना नहीं हुई। एक नंवबर दौरे का अंतिम दिन था और राष्ट्रपति समेत वे सब चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच, कराची हवाईअड्डे पर पहुंच चुके थे। वहीं, से उन्हें पोलैंड के लिए उड़ान भी भरनी थी। 

हमलावर कौन था, क्या था मकसद?

हमले के तुरंत बाद सुरक्षा एजेंसियों ने कैटरिंग वैन चालक को तुरंत गिरफ्तार कर लिया था। उसकी पहचान 32 वर्षीय मोहम्मद अब्दुल्लाह फिरोज के रूप में हुई थी। फिरोज का रुझान कट्टरपंथी मजहबी उग्रवाद की ओर था। वह पाकिस्तानी सेना में ड्राइवर रह चुका था। 1969 में ही उसने पाकिस्तान एयरलाइंस में नौकरी शुरू की थी। 
शोधकर्ता पॉल मैगिंस्की ने लिखा कि अब्दुल्लाह फिरोज ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति को एक पत्र भी लिखा था, जिसमें उसने देश में शरिया कानून लागू करने की मांग की थी। तब लाहौर के अखबार दैनिक आजाद ने अपनी खबर में बताया था कि हमलावर फिरोज जमात-ए-इस्लामी का सदस्य था। उसके सीने पर जमात-ए-इस्लामी का बैज लगा हुआ था।
वह पाकिस्तान एयरलाइंस के मजदूर संगठन पयासी का सदस्य भी था। हालांकि, बाद में जमात-ए-इस्लामी ने उससे संबंध होने से इनकार कर दिया था। जांचकर्ताओं ने पाया कि वह इस्लामी उपदेशक का काम भी करता था और आधुनिक जीवन शैली का घोर विरोधी था। 

कम्युनिज्म मुर्दाबाद के नारे लगाए और बोला- मिशन पूरा हुआ

शोधकर्ता ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया कि हमलावर फिरोज ने गिरफ्तारी के वक्त कम्युनिज्म मुर्दाबाद के नारे लगाए थे और कहा था कि उसका मिशन पूरा हो गया। ऐसा घटना के अगले दिन यानी दो नवंबर, 1970 को अखबारों में प्रकाशित खबरों में भी जिक्र मिलता है। जिस दिन उसे पता चला कि देश में एक ईसाई देश से मेहमान आए हैं। उसी दिन उसने योजना बना ली थी। वारदात वाले दिन उसने अपने साथियों से बातचीत में जिहाद को लेकर बात की थी। अपनी शिफ्ट पूरी कर घर जाने के बाद वह वापस हवाईअड्डे आया था। 

सजा-ए-मौत तक भी नहीं कबूला गुनाह
मामले की जांच पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के जज की अध्यक्षता में हुई। वहीं, सुनवाई विशेष सैन्य अदालत में की गई। जांच के दौरान मोहम्मद अब्दुल्लाह फिरोज ने अपना गुनाह कबूल नहीं किया था। कराची के डिस्ट्रिक्ट हॉल में सैन्य अदालत के पैनल लेफ्टिनेंट कर्नल अहमद साद बाजवा, मेजर मिर्जा मुर्तजा अली और एडिशनल सिटी मजिस्ट्रेट जनाब अरशत ने उसे सजा-ए-मौत का फैसला सुनाया।  

ऐसे दिया था हमले को अंजाम 

उस वक्त कोर्ट ने कहा कि जब फिरोज ने पाकिस्तान एयरलाइंस की केटरिंग वैन 149 को एयरपोर्ट लाउंज पर चाबी के साथ  खड़े देखा तो वह उसमें सवार हो गया और उसने तेजी से चलाते हुए विदेशी मेहमानों को रौंद दिया। पुलिसकर्मियों ने प्रोटोकॉल तोड़ने पर उसे रोकने की कोशिश भी की थी, लेकिन उस पर जुनून सवार था। 

जब साजिश को लेकर छिड़ी बहस 
इस हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया और पाकिस्तान की राजनीति में काफी हल-चल मच गई थी। हमले को लेकर साजिश वाली कई बातें सामने आने लगी थी। पाकिस्तान के स्थानीय मीडिया ने इसमें पोलैंड दूतावास के अधिकारियों की मिलीभगत तक का आरोप लगा दिया था। वहीं, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रमुख जुल्फिकार अली भुट्टो ने इसे अंतरराष्ट्रीय साजिश बता डाला। वहीं, अदालत ने इसे सिर्फ व्यक्तिगत अपराध माना। 

कराची सेंट्रल जेल में पत्रकारों के सामने हुई फांसी
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मोहम्मद अब्दुल्लाह फिरोज को 14 जुलाई, 1971 को कराची की सेंट्रल जेल में फांसी के फंदे पर लटकाया गया। मामला अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों वाला था, इसलिए मोहम्मद अब्दुल्लाह फिरोज की फांसी के कवरेज के लिए जेल में कई पत्रकार आमंत्रित किए गए थे। कराची के असिस्टेंट कमिश्नर जनाब मोहम्मद शफीक खान की मौजूदगी में उसे फांसी दी गई। मजहबी रस्मों के बाद उसे मलिर के क्रबिस्तान में दफना दिया गया। 
 
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