ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के छह महीने: अमेरिकी राष्ट्रपति के कौन से फैसलों का दुनिया पर असर, वादों पर कितने खरे?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 22 Jul 2025 02:54 PM IST
सार
ट्रंप प्रशासन ने बीते छह महीने में क्या-क्या अहम फैसले लिए हैं? व्हाइट हाउस किन उपलब्धियों को हासिल करने की बात कह रहा है? उसके इन फैसलों का दुनिया पर क्या असर पड़ा है? ट्रंप के कौन से वादे अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं? आइये जानते हैं...
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल को अब छह महीने पूरे हो चुके हैं। जनवरी 2025 में राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के दौरान ट्रंप ने अपने पहले भाषण में कई वादे किए थे। इनमें अमेरिका की घरेलू नीति के साथ-साथ विदेश नीति को बदलने की भी चर्चाएं थीं। इतना ही नहीं ट्रंप ने टैक्स नीति में सुधार के साथ आर्थिक विकास बढ़ाने और अप्रवासियों और आव्रजन के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाने का भी दावा किया था।
हालांकि, अब छह महीने बाद यह जानना जरूरी है कि आखिर डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने इस दौरान क्या-क्या अहम फैसले लिए हैं? खुद ट्रंप प्रशासन किन उपलब्धियों को हासिल करने की बात कह रहा है? उसके इन फैसलों का दुनिया पर क्या असर पड़ा है? ट्रंप के कौन से वादे अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं? आइये जानते हैं...
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप।
- फोटो : अमर उजाला
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल को अब छह महीने पूरे हो चुके हैं। जनवरी 2025 में राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के दौरान ट्रंप ने अपने पहले भाषण में कई वादे किए थे। इनमें अमेरिका की घरेलू नीति के साथ-साथ विदेश नीति को बदलने की भी चर्चाएं थीं। इतना ही नहीं ट्रंप ने टैक्स नीति में सुधार के साथ आर्थिक विकास बढ़ाने और अप्रवासियों और आव्रजन के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाने का भी दावा किया था।
हालांकि, अब छह महीने बाद यह जानना जरूरी है कि आखिर डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने इस दौरान क्या-क्या अहम फैसले लिए हैं? खुद ट्रंप प्रशासन किन उपलब्धियों को हासिल करने की बात कह रहा है? उसके इन फैसलों का दुनिया पर क्या असर पड़ा है? ट्रंप के कौन से वादे अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं? आइये जानते हैं...
उपलब्धियों को लेकर क्या हैं ट्रंप प्रशासन के दावे?
व्हाइट हाउस की तरफ से जारी बयान के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने बीते छह महीनों में कई अहम उपलब्धियां हासिल की हैं। इनमें अर्थव्यवस्था को संभालने से लेकर नौकरियां बढ़ाने और आव्रजन के मसले को ठीक ढंग से संभालने जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसके अलावा ट्रंप ने अपनी विदेश नीति को भी उपलब्धि करार दिया है।
1. अर्थव्यवस्था और नौकरियां
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि उसके सांसदों ने 'वन बिग ब्यूटिफुल बिल' पास कराया, जिससे अमेरिका के लोगों को सबसे बड़ी कर छूट हासिल हुई। इससे 14 लाख अवैध प्रवासियों के लाभ को खत्म किया गया और नागरिकों को फायदा पहुंचाया गया। इसके अलावा जनवरी 2025 से जुलाई के बीच अमेरिका में 6,71,000 नौकरियां पैदा किए जाने का दावा किया गया। साथ ही अमेरिका में निवेश के बढ़ने की बात कही गई है।
2. सीमा और आव्रजन
ट्रंप प्रशासन के मुताबिक, जून आते-आते अमेरिका में सीमा से अवैध घुसपैठ का आंकड़ा महज 6070 का रह गया, जो कि जून 2024 के 27,000 के आंकड़े से काफी कम है। इसके अलावा हर महीने डिपोर्टेशन भी बढ़ाया गया है। कई संदिग्ध आतंकियों ने खुद ही अमेरिका छोड़ दिया। अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे करीब 1,00,000 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया।
3. विदेश नीति
ट्रंप ने अपने पहले छह महीने के कार्यकाल में 23 वैश्विक नेताओं से मुलाकात की। इस दौरान नाटो में अहम समझौता हुआ, जिसके तहत साझेदार देशों ने अपनी जीडीपी का 5% रक्षा के लिए खर्च करने पर सहमति जताई। ट्रंप ने यूक्रेन के लिए अहम सैन्य समर्थन समझौते पर हस्ताक्षर किया जिसका खर्च नाटो उठाएगा।
व्हाइट हाउस की तरफ से यह भी दावा किया गया कि ट्रंप ने इस्राइल और गाजा के बीच संघर्षविराम कराने की कोशिशें जारी रखी हैं। साथ ही उन्होंने भारत-पाकिस्तान और इस्राइल-ईरान के बीच जंग को रुकवाने में अहम भूमिका निभाई।
4. वैश्विक व्यापार
इसके अलावा वैश्विक व्यापार में अमेरिका ने ब्रिटेन, चीन, इंडोनेशिया और यूक्रेन जैसे देशों से समझौते किए। अमेरिका की तरफ से लागू टैरिफ ने इस साल 90 अरब डॉलर तक जुटा लिए हैं। जून में अमेरिका का कुल व्यापार लाभ 27.2 अरब डॉलर रहा है, जो कि जून 2005 के बाद से पहली बार बढ़ोतरी है।
5. सामाजिक नीति
ट्रंप प्रशासन के मुताबिक, राष्ट्रपति ने कुल 170 कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत ट्रांसजेंडर्स को महिलाओं के खेल से बाहर कर दिया गया। इसके अलावा स्कूलों और कॉलेजों में लैंगिक मुद्दों से जुड़े कार्यक्रमों की फंडिंग बंद कर दी गई।
दुनिया पर क्या हुआ असर, कौन से वादे अब तक अधूरे?
1. रूस-यूक्रेन संघर्ष
अमेरिकी राष्ट्रपति की तरफ से 20 जनवरी 2025 को पद संभालने के बाद रूस-यूक्रेन जंग को 24 घंटे के अंदर रुकवाने का दावा किया गया था। ट्रंप ने इससे जुड़े दावे अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान भी किए थे और कहा था कि वे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को रोकने में सफल होंगे। हालांकि, छह महीने बीतने के बाद भी रूस-यूक्रेन संघर्ष रुकने की जगह और बढ़ गया। खुद डोनाल्ड ट्रंप ने इसे लेकर कई बार पुतिन से फोन पर बात की। हालांकि, वे युद्ध रुकवाने में न सिर्फ असफल रहे, बल्कि अब रूस और उसके सहयोगियों को सेकेंडरी टैरिफ लगाने की धमकी देकर नतीजे पाने की कोशिश में हैं।
2. इस्राइल के संघर्ष
रूस-यूक्रेन संघर्ष की तरह ही ट्रंप ने इस्राइल और हमास के बीच संघर्षविराम लागू कराने से जुड़े दावे किए थे। हालांकि, इस दौरान इस्राइल ने न सिर्फ गाजा पर हमले बढ़ाए, बल्कि लेबनान, ईरान और सीरिया को भी निशाना बनाया। खुद अमेरिका ने ट्रंप के नेतृत्व में यमन और ईरान में हमले किए। ईरान में तो अमेरिका के बमवर्षक विमान ने बंकर बस्टर ब से हमला किया, जिससे अमेरिका पश्चिम एशिया में एक और संघर्ष में घिरता दिखा।
3. आव्रजन
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन आव्रजन से जुड़े मुद्दे को अपनी बड़ी उपलब्धि बता चुका है। हालांकि, वैश्विक स्तर पर अमेरिका की तरफ से वीजा नीति और नागरिकता के पैमाने को सख्त करने का असर दिखने लगा है। जहां डिपोर्टेशन को लेकर कई देशों ने ट्रंप से नाराजगी जताई तो वहीं अब अमेरिका में वैध तरीके से पढ़ाई के लिए जाने वाले छात्रों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल भारत से पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने वाले स्टूडेंट्स की संख्या 70 फीसदी तक कम रह सकती है। इसके अलावा अमेरिका में पर्यटन के लिए जाने वाले लोगों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है और लोग अब दूसरे देशों को वैकल्पिक गंतव्य के तौर पर चुन रहे हैं।
ट्रंप की तरफ से अलग-अलग राज्यों में अवैध प्रवासियों को खोजने और उन्हें डिपोर्ट करने के प्रयासों के खिलाफ बड़े स्तर पर प्रदर्शन भी देखने को मिले हैं। इस दौरान ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें अमेरिकी नागरिकों को भी हिरासत में ले लिया गया। इसके अलावा ट्रंप ने कभी अपने समर्थक रहे एलन मस्क की नागरिकता को लेकर चेतावनी देते हुए उन्हें उनके जन्म वाले देश दक्षिण अफ्रीका भेजने तक की चेतावनी दी है। ऐसे ही कुछ संकेत उन्होंने न्यूयॉर्क के मेयर पद के उम्मीदवार जोहरान ममदानी और कॉमेडियन रोजी ओ डॉनेल की नागरिकता को लेकर भी दिया है।
4. विदेश नीति
डोनाल्ड ट्रंप ने अलग-अलग मौकों पर विदेश नीति की उपलब्धियों के तौर पर भारत-पाकिस्तान का संघर्ष और इस्राइल-ईरान संघर्ष रुकवाने का जिक्र किया है। हालांकि, अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने अपने कई मित्र देशों को लेकर ऐसे बयान दिए, जिन्हें लेकर नाराजगी जाहिर की जा चुकी है। इनमें सबसे पहला उदाहरण कनाडा का है, जिसे ट्रंप कई मौकों पर अमेरिका का 51वां राज्य बनाने का प्रस्ताव देते रहे हैं। इतना ही नहीं कनाडा के प्रधानमंत्री रहे जस्टिन ट्रूडो को ट्रंप ने कई मौकों पर गवर्नर ट्रूडो कहकर संबोधित किया। इसके बाद पीएम बने मार्क कार्नी ने ट्रंप के बयानों और टैरिफ युद्ध शुरू करने से जुड़े फैसलों का जबरदस्त विरोध किया।
कुछ इसी तरह ट्रंप ने डेनमार्क के शासन के अंतर्गत आने वाले ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकियां भी दी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने जापान, दक्षिण कोरिया और मैक्सिको जैसे करीबी देशों पर उच्च टैरिफ लगाने का एलान भी किया है, जिससे इन देशों में ट्रंप की नीतियों को लेकर नाराजगी जताई गई। दूसरी तरफ ट्रंप ने कई मौकों पर भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रुकवाने में अपनी भूमिका को लेकर झूठे बयान भी दिए हैं। इन्हें लेकर भारत ने अलग-अलग मौकों पर ट्रंप के दावों को झुठलाया है। इसके बावजूद ट्रंप अपने बयानों पर कायम रहे हैं।
5. व्यापार समझौते
डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से दावा किया गया है कि अलग-अलग देशों पर आयात शुल्क लगाकर उन्होंने अमेरिका को जबरदस्त फायदा पहुंचाया है। ट्रंप का मानना था कि इस कदम से अमेरिका हर साल छह ट्रिलियन डॉलर तक जुटा सकता है। लेकिन बीते छह महीने में ट्रंप प्रशासन इन टैरिफ से सिर्फ 90 अरब डॉलर जुटाने का ही दावा कर पाया है।
दूसरी तरफ चीन से व्यापार समझौते से पहले ट्रंप ने उस पर उच्च दर से टैरिफ लगाने का एलान किया था। हालांकि, चीन की तरफ से दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति पर रोक लगाए जाने के बाद ट्रंप को कुछ सेक्टरों में उसे छूट देनी पड़ी थी।
इसके अलावा टैरिफ की मार अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ी है। दरअसल, टैरिफ लगने की वजह से अमेरिका में आयातित उत्पादों की कीमत बढ़ने लगी है, जिसके चलते महंगाई बढ़ी है। आलम यह है कि बड़ी संख्या में उपभोक्ता खर्चों को कम कर रहे हैं, जिससे कंपनियों की बिकवाली में कमी आ रही है। नतीजतन भविष्य में आर्थिक नुकसान के साथ अमेरिका में नौकरियों के बड़ी संख्या में जाने का खतरा भी पैदा हो सकता है।