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जलवायु वार्ता: अमेरिका-चीन में सहमति बन जाना ही है एक ‘जीत’!

Sat, 13 Nov 2021 03:15 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ग्लासगो

सार

विशेषज्ञों के मुताबिक इसलिए उसने सबको हैरत में डालते हुए अमेरिका से समझौता कर लिया। लेकिन यह समझौता सिर्फ ‘सतह’ है, ‘छत’ नहीं। यानी अभी दोनों देश सिर्फ एक तल पर आए हैं। दोनों देशों ने जो घोषणा की, उसके मुताबिक वे अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती की गति तेज करेंगे...
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कॉप 26 में जो बाइडन - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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स्कॉटलैंड के शहर ग्लासगो में चल रहे जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन (कॉप-26) में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नहीं आए। इस वजह से चीन की यहां कड़ी आलोचना हुई। लेकिन अब मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि चीन के प्रतिनिधियों ने यहां परदे के पीछे चली बातचीत में अपनी खास भूमिका बनाई। इसी वजह से अमेरिका से उसका खास जलवायु समझौता हो सका। अमेरिका और चीन दुनिया में कार्बन गैसों के दो सबसे बड़े उत्सर्जक देश हैं। इसलिए उनके बीच सहमति बनने से यहां राहत महसूस की गई है।

जलवायु दूतों के तालमेल पर नजर

विश्लेषकों के मुताबिक दोनों देशों के बीच हुए समझौते में मुख्य ध्यान 2015 में जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए हुई पेरिस संधि के प्रभावी अमल पर केंद्रित रखा गया है। इसमें कार्बन गैसों में उत्सर्जन संबंधी कटौती के कोई नए लक्ष्य तय नहीं किए गए हैं। इसलिए कई जानकारों ने इस सहमति को किसी अंतिम समझौते की दिशा में पहला कदम माना है। उनके मुताबिक ये समझौता कैसा होगा या कब तक होगा, यह दोनों देशों के संबंधों पर निर्भर करता है। यह इस पर भी निर्भर करता है कि बाइडेन प्रशासन के जलवायु दूत जॉन केरी और चीन के जलवायु दूत शिये झेनहुआ के बीच कैसा निजी तालमेल उभरता है।

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चीन की तरफ से यहां परदे के पीछे चली वार्ताओं में शिये झेनहुआ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश थिंक टैंक चैटहम हाउस में अनुसंधान निदेशक बर्निस ली ने अमेरिकी न्यूज वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा कि इन वार्ताओं में चीनी प्रतिनिधि का जोर मुख्य रूप से इस पर रहा कि पेरिस संधि में जो लक्ष्य तय हुए थे, उनका पालन किया जाए। ली के मुताबिक ऐसा लगता है कि चीन इस मौके पर कार्बन कटौती के संबंध में अधिक महत्वाकांक्षी होने को तैयार नहीं हैं। ली ने कहा कि ग्लासगो में चीन की कुल रणनीति यह रही कि अगर यहां कोई ठोस समझौता नहीं होता है, तो उसका दोष उसके माथे पर ना आए।

धरती के तापमान में वृद्धि को सीमित रखने की कोशिश

विशेषज्ञों के मुताबिक इसलिए उसने सबको हैरत में डालते हुए अमेरिका से समझौता कर लिया। लेकिन यह समझौता सिर्फ ‘सतह’ है, ‘छत’ नहीं। यानी अभी दोनों देश सिर्फ एक तल पर आए हैं। दोनों देशों ने जो घोषणा की, उसके मुताबिक वे अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती की गति तेज करेंगे। उन्होंने 2030 तक जितनी कटौती का एलान किया था, उस लक्ष्य को उस समयसीमा से पहले हासिल कर लेने की कोशिश वे करेंगे। इसका मकसद यह है कि धरती के तापमान में वृद्धि को साल 2100 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए।

वैसे विश्लेषकों का कहना है कि इस समझौते से भी एक बार फिर यही जाहिर हुआ कि अमेरिका और चीन के संबंध इस समय कितने तनावपूर्ण हैं। दोनों देशों की बातचीत के बाद चीनी दल ने अमेरिका से पहले ही पत्रकारों से बातचीत कर ली और सहमति के दस्तावेज को वेबसाइट पर डाल दिया। जबकि संयुक्त घोषणा के मामलों में ऐसा नहीं किया जाता है। जब साझा प्रेस कांफ्रेंस हुई, तो चीनी प्रतिनिधिमंडल को जितना समय तय हुआ था, उससे अधिक समय तक उसने सवालों के जवाब दिए। इस वजह से जॉन केरी और उनकी टीम को कई मिनट तक खामोश बैठे रहना पड़ा।

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इसके बावजूद जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों में सहमति बनना ही एक ‘जीत’ है। इससे जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने की संभावना बेहतर हुई है।

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