रियो ओलंपिक के समय दुनिया में ऐसे साढ़े छह करोड़ लोग थे, जिन्हें अपने देश से जबरन विस्थापित होना पड़ा था। अब ये संख्या आठ करोड़ 20 लाख तक पहुंच गई है। टोक्यो ओलंपिंक के दौरान ये बात बार-बार कही गई कि अगर शरणार्थी किसी एक देश का हिस्सा होते, तो जनसंख्या के लिहाज से उनका देश दुनिया का 20वां सबसे बड़ा देश होता।
लोगों के शरणार्थी बनने की कई वजहें होती हैं। उनमें युद्ध, गृह युद्ध, आर्थिक संकट और जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा हो रही स्थितियां शामिल हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग इनमें सबसे ऩई समस्या के रूप में सामने आया है, जो लगातार गंभीर हो रहा है। कोरोना महामारी के कारण दुनियाभर में गरीबी बढ़ी है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि लोग खाना, काम या सुरक्षा की तलाश में ही शरणार्थी बनते हैं। ऐसे में मौजूदा हालात के बीच और भी ज्यादा लोगों के शरणार्थी बनने की आशंका है।
शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संस्थाओं का कहना है कि ओलंपिक खेलों के दौरान शरणार्थी खिलाड़ियों के प्रदर्शन की तारीफ करना काफी नहीं है। ना ही सिर्फ ऐसे मौकों पर उनका मनोबल बढ़ाना पर्याप्त है। असल सवाल यह है कि शरणार्थियों के वैश्विक अधिकारों की व्याख्या की जाए और उन अधिकारों की हर जगह रक्षा की जाए।
इसे अच्छी बात समझा गया है कि ओलंपिक खेलों की वजह से शरणार्थियों की समस्या की तरफ एक बार फिर से दुनिया का ध्यान गया है। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि खेलों के खत्म होने के साथ ही ये ध्यान फिर धूमिल हो गया, तो इन खेलों से शरणार्थियों को कोई स्थायी लाभ नहीं होगा।