म्यांमार में सैनिक शासन विरोधी संघर्ष के अब हिंसक रूप लेने के संकेत मिल रहे हैं। शांतिपूर्ण आंदोलन का सेना ने सख्ती से दमन किया। इस बीच बीते छह महीनों में देश में नागरिक प्रशासन लगभग ढह गया है। आम शासन व्यवस्था की गैर-हाजिरी से देश के कई हिस्सों में अराजक स्थिति है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि अब म्यांमार के सामने दो ही दिशाएं नजर आती हैं। या तो सैनिक शासन आम शासन व्यवस्था को बहाल करने और जनता के एक बड़े हिस्से का भरोसा जीतने में कामयाब होगा या फिर देश में हिंसक संघर्ष का दायरा फैल जाएगा। जातीय अल्पसंख्यकों के इलाके में पहले से ही ऐसी लड़ाई तेज होने के संकेत हैं।
बीते में अप्रैल देश के सुदूर उत्तर-पश्चिमी इलाकों में पीपुल्स डिफेंस फोर्स (पीडीएफ) के रूप में एक बागी गुटों ने खुद को संगठित किया। चिन राज्य के सागैंग में इस नए विद्रोही बल की स्थापना की घोषणा की गई। उसके बाद देश के अलग-अलग इलाकों के सैनिक शासन विरोधी गुट पीडीएफ के इर्द-गिर्द एकजुट होने लगे। जुलाई के मध्य तक लगभग 125 ऐसे अलग-अलग गुटों ने सैनिक शासन के खिलाफ एकजुट होने का एलान किया। बीते अप्रैल में विपक्ष ने नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (एनयूजी) के रूप में वैकल्पिक प्रशासन का एलान किया था। खबरों के मुताबिक पीडीएफ की पहल पर एकजुट हुए तमाम गुटों ने एनयूजी को समर्थन देने की घोषणा की है।
अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि अभी पीडीएफ की ताकत ज्यादा नहीं है। उसके प्रभाव इलाके बाढ़ और कोविड-19 महामारी से जूझ रहे हैं। इसलिए पीडीएफ को अपने पांव फैलाने में दिक्कत पेश आ रही है। इसके बावजूद इस गुट ने अपनी गतिविधियां जारी रखी हैं। साथ ही वह अधिक से अधिक संसाधन जुटाने की कोशिश कर रहा है। पीडीएफ ने कई हिंसक गतिविधियों को अंजाम दिया है। उसने कुछ जगहों पर बमबारी की है और कुछ हत्याएं भी की हैं। वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अभी तक पीडीएफ ‘सॉफ्ट टारगेट्स’ (यानी कम प्रभावी व्यक्तियों) को ही निशाना बनाया है।
रिपोर्टों के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में पीडीएफ ने हथियारबंद बागी गुटों के साथ मिल कर सैनिक शासन के प्रतीकों को निशाना बनाया है। बताया जाता है कि अभी उनके पास हथियार के तौर पर पुराने राइफल और बारूदी सुरंग जैसे विस्फोटक ही हैं। इस वजह से वह अपने हमलों में ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा सका है।
बताया जाता है कि हिंसक हमले नस्लीय अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में अधिक प्रभावी रहे हैं। बताया जाता है कि पीडीएफ के साथ जो गुट एकजुट हुए हैं, उनमें कचिन इंडिपेंडेन्स आर्मी (केआईए), करेन नेशनल लिबरेशन आर्मी (केएनएलए), और करेनी आर्मी भी हैं, जिनका वजूद लंबे समय से रहा है। बताया जाता है कि इन गुटों के पास हथियार हासिल करने के जरिये हैं। उनके जरिए पीडीएफ हथियारों को देशभर में पहुंचाने का माध्यम बन सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि सैनिक दमन के कारण देश में पल रहे असंतोष से पीडीएफ को ज्यादा संख्या में कार्यकर्ता मिल सकते हैं।
इसीलिए जानकार पीडीएफ की गतिविधियों को गंभीरता से ले रहे हैँ। उनका आकलन है कि अगर लंबे समय तक हालात आज जैसे ही बने रहे, तो फिर म्यांमार में आगे चल कर गृह युद्ध जैसी स्थिति बन सकती है।