विश्लेषकों के मुताबिक ऑकुस समझौते में यह नहीं कहा गया है कि इसका मकसद किसी देश को निशाना बनाना है। लेकिन आम संदेश यही गया कि उसका मकसद चीन की घेराबंदी है। इस समझौते को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की गतिविधियों को नियंत्रित करने की पहले से जारी अमेरिकी कोशिशों से जोड़ कर देखा गया है। अमेरिकी मीडिया में छपी टिप्पणियों में भी आम राय यही दिखी है कि ऑकुस के निशाने पर चीन है।
ऑकुस समझौते के एलान के बाद चीन ने इसकी कड़ी निंदा की थी। उसने इस ऑस्ट्रेलिया को परमाणु क्षमता वाली पनडुब्बियां बनाने में मदद करने के अमेरिकी फैसले को ‘बेहद गैर-जिम्मेदाराना’ बताया था। चीन ने कहा था कि ऑकुस से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता पर बहुत खराब असर पड़ेगा और संभव है कि इससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में हथियारों की होड़ शुरू हो जाए।
एक मीडिया में इंटरव्यू में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया चीन के साथ बातचीत के पक्ष में है। लेकिन उन्होंने कहा कि चीन की बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं है। मॉरीसन के इस बयान पर अपनी प्रतिक्रिया में चीन ने कहा कि अभी दोनों के बीच जो राजनयिक हालात बने हैं, उनके लिए पूरी तरह से ऑस्ट्रेलिया ही जिम्मेदार है।
ऑकुस करार का एलान करने के कुछ दिनों के अंदर भी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने व्हाइट हाउस में क्वैंड्रेगुलर सिक्युरिटी डॉयलॉग (क्वैड) में शामिल चारों देशों के नेताओं की शिखर बैठक की अध्यक्षता की। इस समूह का मकसद भी चीन की ताकत को नियंत्रित करना माना जाता है। विश्लेषकों के मुताबिक इस घेरेबंदी के बीच अमेरिकी सेना का चीन से नरम लहजे में बातचीत करने से भ्रामक संदेश गया है।