अमेरिकी विश्लेषकों ने अंदेशा जताया है कि एक हिंसक इस्लामी आंदोलन की अफगानिस्तान में हुई जीत से दुनियाभर में जिहादियों का मनोबल बढ़ेगा। मुमकिन है कि वे तालिबान को अपना मार्गदर्शक समझें और उससे मदद हासिल करने की कोशिश करें। अमेरिकी फौज के अफगानिस्तान में कमांडर रह चुके जॉन एलन ने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा है कि अमेरिकी फौज की वापसी के बाद अब हिंदुकुश पहाड़ी वाले इलाके में अल-कायदा खुल कर अपनी गतिविधियां चला सकता है। बाइडेन प्रशासन ने कहा है कि उसे ऐसी सूचना मिली, तो वह जवाबी हमले करेगा। लेकिन जनरल एलन ने कहा कि जब तक जमीन पर आपके लोग ना हों, अफगानिस्तान में आतंक विरोधी कार्रवाई करना बेहद मुश्किल काम साबित होता है।
पास-पड़ोस पर संभावित परिणाम की समीक्षा करते हुए फाइनेशियल टाइम्स में गिडियन रेचमैन ने लिखा है- ‘भारत को अब जम्मू-कश्मीर में अधिक अशांति के लिए तैयार रहना होगा। चीन के लिए भी चिंता की बात है, जिसे शिनजियांग प्रांत में उइगर उग्रवाद का सामना करना पड़ा है। ये उग्रवादी अब अफगानिस्तान में अपना अड्डा बना सकते हैं। ईरान भले ही अमेरिका की हार पर खुश हो, लेकिन उसे हजारा समुदाय को लेकर चिंतित होना पड़ सकता है। तालिबान ने अतीत में इस शिया समुदाय का क्रूर दमन किया है। इसके अलावा अमेरिका और अफगानिस्तान के तमाम पड़ोसियों को बड़ी संख्या में शरणार्थियों के पहुंचने की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है।’
कई विश्लेषकों ने कहा है कि भले तालिबान के पाकिस्तान के साथ गहरे रिश्ते रहे हों, लेकिन जिस तरह तालिबान ने जीत हासिल की है, उससे पाकिस्तान के लिए भी खतरे पैदा हो सकते हैं। इससे पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों का मनोबल बढ़ेगा, जो पाकिस्तान के उदारवादी शख्सियतों को निशाना बना सकते हैं।
लेकिन कुछ विश्लेषकों ने कहा है कि चीन अगर तालिबान के साथ कामकाजी संबंध बनाने में कामयाब हुआ, तो उसे अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को बढाने का एक और मौका मिलेगा। साथ ही ताजा घटनाक्रम से उसे यह कहने का मौका मिला है कि ये घटनाएं दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व के अंत का एक और सबूत हैं।