अफगान युद्ध में लड़ चुके पूर्व अमेरिकी नौसैनिक जेक वुड ने एक इंटरव्यू में कहा है- ‘ये घटना हमारे राष्ट्र की प्रतिष्ठा पर एक धब्बा है। हमने अपने उन अफगान सहयोगियों के प्रति अपना कर्त्तव्य नहीं निभाया, जिन्होंने हमारा साथ दिया था।’ आलोचनाओं से घिरे राष्ट्रपति बाइडन के बचाव के लिए सोमवार को उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवान मीडिया के सामने आए। उन्होंने कहा- ‘राष्ट्रपति ने सोचा था कि अफगान के राष्ट्रीय सुरक्षा बल लड़ने के लिए आगे आएंगे। हमने उन्हें ट्रेनिंग देने और सर्वश्रेष्ठ उपकरण देने पर 20 साल तक अरबों डॉलर खर्च किए। लेकिन जब वक्त आया, तो उन्होंने अपने देश के लिए ना लड़ने का फैसला किया।’
कुछ विश्लेषकों का भी कहना है कि बाइडन के माथे पर 20 साल तक हुई गड़बड़ियों का ठीकरा फोड़ा जा रहा है। जबकि बाइडन ने वही फैसला किया, जो ज्यादातर अमेरिकियों की राय रही है। जनमत सर्वेक्षणों में लंबे युद्ध से थक चुके अमेरिकियों का भारी बहुमत सैन्य वापसी का समर्थन करता रहा है। इसलिए विश्लेषकों का कहना है कि अगर बाइडन तालिबान की बढ़त रोकने का फैसला करते, तो उसके लिए उन्हें अपने देश में अलोकप्रिय होने का जोखिम उठाना पड़ता। तब उन्हें हजारों सैनिक फिर से अफगानिस्तान भेजने पड़ते, जिसके लिए जन समर्थन का अभाव होता। इसीलिए कई विश्लेषणों में कहा गया है कि अभी फौरी माहौल भले बाइडन के खिलाफ हो, लेकिन अफगानिस्तान की घटनाओं से उन्हें कोई दूरगामी सियासी नुकसान होगा, इसकी संभावना कम है।