विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि बीते 26 अगस्त को काबुल हवाई अड्डे पर हुए बम धमाके के बाद से आईएसआईएस-के अमेरिका के निशाने पर भी है। हवाई अड्डे पर हुए बम हमले में 170 से ज्यादा लोग मारे गए थे, जिनमें 13 अमेरिकी सैनिक थे। बीते एक सितंबर को अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी जनरल मार्के मिले ने कहा था कि आईएसआईएस-के खिलाफ कार्रवाई में यह मुमकिन है कि अमेरिका तालिबान के साथ सहयोग करे।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अब तालिबान और आईएसआईएस-के में खुल कर लड़ाई छिड़ गई है। उनके मुताबिक आईएसआईएस-के तालिबान सरकार को अस्थिर करना चाहता है। उसने अपने साप्ताहिक पत्र अल-नबा में कहा है कि तालिबान वास्तविक जिहाद में शामिल नहीं है। उसने आरोप लगाया है कि अफगानिस्तान को एक बार फिर से वैश्विक षड्यंत्र के तहत तालिबान के हाथों में सौंपा गया है।
इटली में वेनिस स्थित शोधकर्ता और अफगानिस्तान में इस्लामी आंदोलन के विशेषज्ञ रिकार्डो वेले ने निक्कई एशिया से कहा- ‘तालिबान सरकार अफगानिस्तान के अलग-अलग समुदायों को जितना अधिक अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेगी, आईएसआईएस-के को उतना ही उसके खिलाफ प्रचार करने का मौका मिलेगा। इससे आईएसआईएस-के को नए लड़ाकू भी मिलेंगे।’ इसलिए विशेषज्ञों का अनुमान है कि अफगानिस्तान में निकट भविष्य में शांति कायम होने की उम्मीद नहीं है।