रूस-पाकिस्तान के विदेश मंत्री
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रूस ने पाकिस्तान में अपने तेल और गैस के लिए नया बाजार हासिल करने की नई पहल शुरू की है। वह पाकिस्तान में अपनी पैठ बढ़ाने की रणनीति पर चल रहा है। उसकी ताजा पहल का फौरी मकसद 2.5 अरब डॉलर के प्राकृतिक गैस पाइपलाइन के निर्माण की योजना को फिर से जिंदा करना है।
लेकिन विश्लेषक इसे रूस की बड़ी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि हाल के वर्षों में रूस ने पाकिस्तान के साथ सुरक्षा में सहयोग का समझौता किया है। उसने अपने हेलीकॉप्टर पाकिस्तान को बेचे हैं। दोनों देशों के बीच साझा सैनिक अभ्यास हुए हैं। अब जबकि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज वापस जा रही है, दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लगातार संपर्क में हैं। रूस ने अफगानिस्तान पर शांति वार्ताएं आयोजित की हैं, जिनमें पाकिस्तान को भी शामिल किया गया है।
वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक विल्सन सेंटर में एशिया प्रोग्राम के उपनिदेशक माइकल कुगलमैन ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ‘रूस अफगानिस्तान में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है। इसमें तालिबान से अपने निकट रिश्तों के कारण पाकिस्तान एक उपयोगी पार्टनर है। साथ ही रूस, चीन के करीब जा रहा है, जिसका पाकिस्तान पुराना सहयोगी है। दूसरी तरफ भारत के साथ उसके पुराने संबंध में अब वह गति नहीं रही। भारत अमेरिका के साथ रिश्ते गहरे कर रहा है।’
गौरतलब है कि बीते 15 जुलाई को एक रूसी प्रतिनिधिमंडल ने इस्लामाबाद पाकस्ट्रीम गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए एक समझौते पर दस्तखत किए। इस समझौते में इस पाइपलाइन के निर्माण संबंधी शर्तें शामिल की गई हैं। ये परियोजना पहले ही प्रस्तावित की गई थी। तब इसका नाम नॉर्थ-साउथ गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट था। लेकिन कुछ मतभेदों के कारण तब इस पर बात आगे नहीं बढ़ सकी।
अब तय हुई शर्तों के मुताबिक 1,100 किलोमीटर लंबी इस पाइपलाइन से पाकिस्तान की प्राकृतिक गैस आयात करने की क्षमता दो गुनी हो जाएगी। अब वह प्रति दिन 1.2 अरब क्यूबिक यूनिट गैस का आयात कर सकेगा। इस पाइपलाइन के टर्मिनल देश के दक्षिणी शहर कराची और उत्तर में पंजाब में बनाए जाएंगे। समझौते में 2023 तक इस पाइपलाइन का निर्माण पूरा कर लेने का लक्ष्य रखा गया है।
विश्लेषकों ने कहा है कि इस पाइपलाइन के जरिए रूस, पाकिस्तान में पहला बड़ा निवेश करेगा। रूस ने (सोवियत दौर में) 1960 और 70 के दशकों में पाकिस्तान में ऑयल एंड गैस डेवलपमेंट कंपनी और पाकिस्तान स्टील मिल्स के निर्माण में मदद दी थी। लेकिन उसके बाद दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ गए। पाकिस्तान तब अमेरिकी खेमे में चला गया। उसने 1980 के दशक में उसने अमेरिका के साथ मिलकर अफगानिस्तान में मौजूद रूसी फौज के खिलाफ लड़ाई में मुजाहिदीन का साथ दिया। लेकिन अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूरोप के साथ-साथ दुनिया के दूसरे क्षेत्रों में भी रूसी ऊर्जा उत्पादों के लिए बाजार ढूंढ रहे हैं। उसका फायदा पाकिस्तान को मिला है।
अमेरिका स्थित कमोडिटी कंसल्टैंसी फर्म प्राइमरी विजन से जुड़े विश्लेषक ओसामा रिजवी ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ‘पाकिस्तान के लिए तो यह सचमुच बहुत सकारात्मक घटना है। इसलिए वह ऊर्जा की कमी की समस्या से जूझ रहा है।’ अब तक पाकिस्तान प्राकृतिक गैस के लिए अपने घरेलू स्रोतों पर ही निर्भर रहा है। लेकिन ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर को अपडेट ना कर पाने के कारण वह बढ़ती मांग के मुताबिक गैस का उत्पादन बढ़ाने में नाकाम रहा है। 2015 के बाद उसने कतर से एलपीजी का आयात शुरू किया। अंतरराष्ट्रीय बाजार से भी वह इसकी खरीदारी करता रहा है।
जानकारों के मुताबिक नए समझौते के ढांचे को इस रूप में तैयार किया गया है, जिससे ये परियोजना अमरिकी प्रतिबंधों से प्रभावित ना हो। इसके तहत इसके स्वामित्व में रूस का हिस्सा 80 फीसदी से घटा कर 26 फीसदी कर दिया गया है। कनाडा स्थित रिस्क एनालिस्ट ओवैस अर्शद न एशिया टाइम्स से कहा- ‘रूस ने स्वामित्व में अपना हिस्सा उस सीमा से नीचे कर दिया है, जिसके बाद अमेरिकी प्रतिबंध लागू होते हैं।’