रूस और चीन ने मिल कर उत्तर कोरिया को प्रतिबंधों से मुक्ति दिलाने की जो मुहिम छेड़ी है, उसके पीछे इन दोनों देशों के मकसद को लेकर अब कयास लगाए जा रहे हैं। दोनों देशों ने इस बारे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक साझा प्रस्ताव इसी हफ्ते पेश किया है। रूस और चीन का कहना है कि उनका मकसद उत्तर कोरिया के आम लोगों को राहत दिलाना है। संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों के हटने से उत्तर कोरिया के कृषि उत्पादों, समुद्री खाद्य, कपड़ा, और तेल उत्पादों को फिर से बाजार मिलेगा। उससे वहां के लोगों के ‘जीवन स्तर में सुधार’ होगा।
लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक इन दोनों देशों को मालूम है कि इस प्रयास में उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। पूरी संभावना है कि इस प्रस्ताव को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस वीटो कर देंगे। इसलिए ये सवाल पूछा जा रहा है कि यह जानने के बावजूद रूस और चीन ने ये साझा दांव क्यों चला? इस बारे में पूछे जाने पर रूस की विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने कहा कि यह एक ‘राजनीतिक- मानवीय’ पहल है। उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों का खराब असर सिर्फ उत्तर कोरिया के शासक वर्ग पर नहीं, बल्कि आम लोगों पर भी पड़ा है।
चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स ने एक हालिया टिप्पणी में चीन और रूस की करीबी को एक विशेष संबंध बताया है। उधर टर्की के इस्तांबुल यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर और रूस और पूर्वी यूरोप के विशेषज्ञ तारिक साइरिल एमर ने रूस की वेबसाइट रशिया टुडे में लिखी एक टिप्पणी में कहा है- ‘रूस और चीन के संबंध क्या रूप लेंगे, यह महत्त्वपूर्ण है। उत्तर कोरिया पर प्रस्ताव के संबंध में अहम है कि इसके जरिए वे अमेरिका और यूरोप को खुलेआम अपने संबंध के बारे में बता रहे हैं।’
उत्तर कोरिया पर लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध लगे हुए हैं। 2006 में जब उसने परमाणु हथियार का परीक्षण किया, तब से इन प्रतिबंधों को और सख्त बनाया गया है। इन प्रतिबंधों का मुख्य मकसद उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था को ठप करना रहा है। ये प्रतिबंध अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों की पहल पर लगाए गए थे। इन देशों का कहना है कि जब तक उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म नहीं करता, ये प्रतिबंध जारी रहेंगे।