आयकर नियमों में बदलाव के जरिये पूर्व प्रभावी कर वसूलने के मामले में भारत सरकार को लगातार दूसरा झटका लगा है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत ने 10,247 करोड़ रुपये के पूर्व प्रभावी कर मामले में ब्रिटिश कंपनी केयर्न एनर्जी के पक्ष में फैसला सुनाया है और भारत सरकार को ब्याज और अदालती खर्च सहित करीब 10,500 करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया है। हालांकि सरकार ने इस फैसले को चुनौती देने का निर्णय लिया है।
केयर्न एनर्जी ने बताया कि यह आदेश तीन सदस्यीय न्यायाधिकरण ने दिया है, जिसमें भारत सरकार की ओर से भी एक न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। मध्यस्थता अदालत ने 582 पेज के फैसले में माना कि केयर्न एनर्जी की भारतीय इकाई केयर्न्स इंडिया पर पूर्व प्रभावी कर लागू करते हुए 2006-07 के दौरान लगाया गया शुल्क नियमों के विपरीत है। भारत सरकार ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय निवेश सुरक्षा संधि के तहत इस कर वसूलने को जायज ठहराने में नाकाम रही है। लिहाजा उसे कंपनी के जब्त किए गए शेयर, लाभांश और टैक्स रिफंड को ब्याज व शुल्क सहित वापस करना होगा। कंपनी का दावा है कि यह कुल राशि करीब 10,500 करोड़ रुपये होगी। केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने कहा है कि फैसले का अध्ययन कर अगला कदम उठाया जाएगा। हालांकि, ऐसे आदेश में फैसले के खिलाफ अपील करने का प्रावधान नहीं होता है।
ये है पूरा मामला
केयर्न एनर्जी ने 2007 में भारतीय इकाई केयर्न्स इंडिया को सूचीबद्ध कराया। केयर्न एनर्जी ने 2011 में कंपनी की 10 फीसदी हिस्सेदारी अपने पास रखकर शेष हिस्सा वेदांता लिमिटेड को बेच दिया था। आयकर विभाग ने 2012 में नियमों में बदलाव कर पूर्व प्रभावी कर लगाते हुए मार्च, 2015 में कंपनी से 10,247 करोड़ का पूंजीगत लाभ कर मांगा। इसकी वसूली के लिए सरकार ने वेदांता में केयर्न्स की 5 फीसदी हिस्सेदारी बेच दी और 1,140 करोड़ का लाभांश व 1,590 करोड़ का टैक्स रिफंड भी जब्त कर लिया। इसके बाद कंपनी ने 2015 में भारत सरकार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत में अपील की।
वोडाफोन से भी हार चुके हैं 22,100 करोड़ का केस
पूर्व प्रभावी कर मामले में सरकार के लिए यह तीन महीने में दूसरा झटका है। सितंबर माह में सरकार को वोडाफोन समूह से 22,100 करोड़ रुपये वसूलने के मामले में हार मिली थी। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत ने इस मामले में भी सरकार को 85 करोड़ रुपये कानूनी खर्च के अलावा ब्याज व शुल्क सहित राशि लौटाने को कहा है। हालांकि, 23 दिसंबर तक सरकार ने वोडाफोन को कोई राशि नहीं दी थी। वोडाफोन और केयर्न इंडिया के मामले पर विदेशी निवेशकों की भी निगाहें लगी हुई हैं।