नए बने हालात को लेकर पश्चिम एशिया में मोटे तौर पर दो तरह की राय उभरी है। उनमें एक यह है कि नई स्थितियों के बीच अब खाड़ी में मौजूद अरब देश ईरानी खतरे का मुकाबला करने के मकसद से इस्राइल के ज्यादा करीब चले जाएंगे। दूसरी राय यह है कि अमेरिका का सहारा न रहने के बाद अब खाड़ी देशों और ईरान के बीच मेलमिलाप की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि 2019 में जब सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर ड्रोन हमले हुए और उस पर अमेरिका ने कोई कार्रवाई नहीं की, तभी संकेत मिल गया था कि अब अमेरिका पहले जैसा हस्तक्षेप नहीं करेगा। इन हमलों के लिए सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों ने ईरान को दोषी माना था।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक पश्चिम एशियाई देशों के रिश्तों में बदलाव के संकेत अभी से मिलने लगे हैं। यूएई ने टर्की और कतर से उच्चस्तरीय बातचीत की है, जबकि पहले उसने आरोप लगाया था कि ये दोनों देश आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं। सऊदी अरब ने भी इन देशों से रिश्ते सुधारने की कोशिश की है। पिछले हफ्ते इराक की राजधानी बगदाद में एक क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन हुआ। उसी दौरान ईरान के नए विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियान की यूएई के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन राशिद से मुलाकात हुई। इसे वहां हुई सबसे अहम घटना बताया गया।