दिसंबर की शुरुआत में चरमपंथ के ख़िलाफ़ सऊदी अरब के नेतृत्व में एक सैन्य गठबंधन की घोषणा हुई थी। इसमें शामिल होने के मुद्दे पर पाकिस्तान सरकार और फ़ौज दुविधा में हैं। सऊदी अरब के शाह परिवार के साथ अच्छे संबंध होने के बावजूद पाकिस्तान इस गठबंधन का हिस्सा बनने में हिचकिचा रहा है।
विशेषज्ञ इसकी वजह पाकिस्तान की घरेलू और क्षेत्रीय मजबूरियों को मान रहे हैं। 15 दिसंबर को जब इस गठबंधन की नींव रखने की घोषणा सऊदी अरब के रक्षा मंत्री और डिप्टी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने की, तब पाकिस्तान का नाम इसके एक अहम सदस्य के रूप में लिया गया था। पाकिस्तान के अलावा मिस्र, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात जैसे अरब देशों के साथ तुर्की, मलेशिया, खाड़ी अरब और अफ्रीका के इस्लामी देश इस गठबंधन की सूची में थे।
इस सूची में ईरान की ग़ैरमौजूदगी अरब दुनिया में सीरिया से लेकर यमन तक पर सऊदी अरब और ईरान के बीच तल्खी को दिखाती है। पाकिस्तान का नाम इस सैन्य गठबंधन में शामिल होने को लेकर उस वक़्त कुछ उलझन हो गई, जब इस्लामाबाद में अधिकारियों ने ऐसी किसी भी बात को लेकर कोई जानकारी न होने की बात कही।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पाकिस्तानी मीडिया में कहा, "हमें इसकी (गठबंधन के बारे में) जानकारी मीडिया रिपोर्टों से मिली है। हमने सऊदी अरब में अपने राजदूत से इस बारे में विस्तार से जानने को कहा है।" हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस सैन्य गठबंधन का स्वागत किया है पर कहा कि पाकिस्तान के इसमें शामिल होने की संभावना सऊदी अरब की ओर से विस्तार से बताए जाने पर निर्भर है।
पाकिस्तान के ईरान के साथ रिश्ते खराब हो सकते
इस गठबंधन का हिस्सा बनने से पाकिस्तान के ईरान के साथ रिश्ते खराब हो सकते हैं। ईरान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते अभी दोस्ताना हैं। कई लोगों का मानना है कि पाकिस्तान अपने देश में शिया विरोधी गठबंधन का हिस्सा बनने के कारण सांप्रदायिक तनाव बढ़ने को लेकर भी डरता है। वे रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ की टिप्पणी का हवाला देते हैं, जो उन्होंने यमन के ख़िलाफ़ सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने के प्रस्ताव के वक़्त की थी।
उन्होंने तब कहा था, "हम किसी भी उस टकराव का हिस्सा नहीं बनेंगे जो मुस्लिम दुनिया में मतभेदों को बढ़ावा दे।" ऐसा लगता है कि पाकिस्तान मध्य पूर्व में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले किसी भी गठबंधन का हिस्सा बनने को लेकर बहुत सजग है और अपनी शर्तों पर ही इसका हिस्सा बनना चाहता है। पाकिस्तान के विदेश सचिव ने सीनेट के विदेश मामलों की कमेटी के सामने 24 दिसंबर को साफ़-साफ़ कहा कि पाकिस्तान सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार पलटने की किसी भी कोशिश के ख़िलाफ़ है।
विदेश मामलों पर प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने 22 दिसंबर को सीनेट से कहा कि सऊदी नेतृत्व वाले 34 देशों के गठबंधन से कुछ इस्लामी देशों के बाहर जाने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होगी। ऐसे बयान से ज़ाहिर होता है कि पाकिस्तान गठबंधन का हिस्सा होने को लेकर अब तक स्पष्ट नहीं है।
जब पाकिस्तान ने 2015 में यमन के ख़िलाफ़ सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा बनने से मना कर दिया, तो इस पर सऊदी अरब ने कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी थी। लेकिन संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान के इनकार पर उसकी कड़ी निंदा की थी। संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मामलों के राज्य मंत्री अनवर गारगाश ने एक ट्वीट में कहा था, "जीसीसी (खाड़ी कॉर्पोरेशन काउंसिल) के साथ रणनीतिक संबंध के पक्ष में रहें या भारी क़ीमत चुकाएं।"