पाकिस्तान के लाहौर हाईकोर्ट ने स्वतंत्रता संग्राम के नायक भगत सिंह को हुई फांसी की सजा के मामले को फिर से खोलने और उन्हें मरणोपरांत राज्य पुरस्कारों से सम्मानित करने की याचिका पर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि यह मामला सुनवाई योग्य नहीं है। बता दें कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कथित षड्यंत्र रचने के आरोप में मुकदमा चलाने के बाद अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह को उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी। भगत सिंह को पहले आजीवन कारावास की सजा दी गई थी लेकिन बाद में मनगढ़ंत आरोप लगाकर उन्हें मौत की सजा दे दी।
एक दशक से लंबित है याचिका
पाकिस्तान में भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष और मामले में याचिकाकर्ता अधिवक्ता इम्तियाज राशिद कुरैशी ने भगत सिंह की सजा के मामले को फिर से खोलने की मांग की थी। हालांकि लाहौर हाईकोर्ट ने इस पर शीघ्र सुनवाई और बड़ी पीठ के गठन पर आपत्ति जताई। लाहौर हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका बड़ी पीठ के गठन के लिए सुनवाई योग्य नहीं है। याचिकाकर्ता कुरैशी ने कहा कि वरिष्ठ वकीलों के एक पैनल ने, जिसका वह भी हिस्सा हैं, लाहौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। यह याचिका बीते एक दशक से लंबित है। साल 2013 में तत्कालीन जस्टिस शुजात अली खान ने एक बड़ी पीठ के गठन के लिए मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा था, लेकिन तब से ही यह मामला लंबित है। अब हाईकोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य नहीं बताकर बड़ी पीठ के गठन पर आपत्ति जता दी है।
'भगत सिंह ने उपमहाद्वीप की आजादी की लड़ाई लड़ी'
लाहौर हाईकोर्ट में लंबित याचिका में कहा गया है कि भगत सिंह ने उपमहाद्वीप की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। भगत सिंह का उपमहाद्वीप में न केवल सिखों और हिंदुओं बल्कि मुसलमानों द्वारा भी सम्मान किया जाता है। पाकिस्तान के संस्थापक कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने भी दो बार सेंट्रल असेंबली में दिए अपने भाषणों में भगत सिंह को श्रद्धांजलि दी थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि यह राष्ट्रीय महत्व का मामला है और इसे पूर्ण पीठ के समक्ष तय किया जाना चाहिए।