कोरोना के दौर में अन्य बीमारी के कारण भी अस्पताल में भर्ती होना खतरे से खाली नहीं है। पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड ( पीएचई ) के अनुसार, पहली लहर में अन्य तकलीफ से अस्पताल में भर्ती दस में से एक मरीज को कोरोना ने चपेट में लिया था।
पीएचई के मुताबिक, ब्रिटेन में बचाव में लापरवाही और सीमित जांच सुविधा के कारण यह हुआ। एक अगस्त 2020 तक के आंकड़ों के अनुसार, 11.3 फीसदी लोग अस्पताल में कोरोना की चपेट में आए, जो मई तक 19.6 फीसदी हो गए।
लैंसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 82,624 का अस्पताल में कोरोना के दौरान इलाज हुआ, उसमें से 5,699 से 11,862 मरीजों को वार्ड में कोरोना संक्रमण हुआ। ब्रिटेन के 314 अस्पतालो में 72 हजार मरीजों पर शोध के बाद यह खुलासा हुआ है।
छोटे अस्पातलों में संक्रमण अधिक
शोधकर्ता और आउटब्रेक मेडिसिन के विशेषज्ञ प्रो. कैलम सेंपल का कहना है कि घर में बने अस्पतालों और छोटे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े अस्पतालों में इस तरह के मामले सबसे अधिक 61.9 फीसदी आए थे।
इसी तरह मानसिक रोग से जुड़े अस्पतालों में संक्रमण फैलने की दर 67.5 फीसदी है। अच्छे अस्पतालों में इस तरह के संक्रमण के मामलों की दर महज 9.7 फीसदी थी।
लापरवाही और बदइंतजामी है वजह
यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिघम के फिजिशियन डॉ. क्रिश ग्रीन का कहना है कि अस्पताल में दूसरे मरीजों के संक्रमण की चपेट में आने का प्रमुख कारण लापरवाही और समय पर जांच की सुविधा का अभाव है।
संक्रमण पीक पर पहुंचा और एयरबॉर्न हुआ तो इस कारण भी अधिक से अधिक दूसरे रोग से ग्रसित मरीज कोरोना की चपेट में आए। ऐसे मामले दुनिया के हर देश में सामने आए होंगे।
टीके से हजारों लोगों की जान बची
ब्रिटेन कोरोना के डेल्टा वैरिएंट से जूझ रहा है। पीएचई ने कहा है कि टीकाकरण शुरू होने के बाद देश में 84 हजार लोगों को मौत के मुंह में से, 2.34 करोड़ लोगों को संक्रमित होने और 67 हजार लोगों को अस्पताल में भर्ती होने से बचाया गया है। पीएचई के टीकाकरण विशेषज्ञ डॉ. मैरी रमासे का कहना है कि टीका सुरक्षित और जीवनरक्षक है। शोध में उसके प्रभाव का नतीजा सामने आ गया है।