पाकिस्तानी तालिबान पर पाकिस्तान में प्रतिबंध लगा हुआ है। वह पाकिस्तान में कई भयंकर हमले करने के लिए जिम्मेदार रहा है। पाकिस्तानी तालिबान का जन्म भी अफगान तालिबान से ही हुआ है। वह अफगान तालिबान जैसी ही विचारधारा में यकीन करता है। विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि पिछले महीने अफगानिस्तान में अपना कब्जा बढ़ने पर जिन कैदियों की तालिबान ने सबसे पहले रिहाई की, उनमें पाकिस्तानी तालिबान का उप-प्रमुख फकीर मोहम्मद भी है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक हाल में पाकिस्तान सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने पाकिस्तानी सांसदों के सामने कहा था कि अफगान तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे का जिन लोगों ने समर्थन किया है, उनमें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व प्रमुख असद दुर्रानी भी हैं। उन्होंने द गार्जियन से कहा- ‘अफगानिस्तान की आम जनता तालिबान के कब्जे से खुश है। चिंतित सिर्फ सभ्रांत तबकों के लोग हैं, जिनकी लूट और गरीबों का शोषण करने की क्षमता पर अब रोक लग जाएगी।’ बताया जाता है कि 1990 के दशक में आईएसआई के प्रमुख के रूप में तालिबान को खड़ा करने में दुर्रानी ने अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा- ‘तालिबान पाकिस्तान में विचारधारा या राजनीति को प्रभावित करना नहीं चाहता। यह पूरी तरह हम पर है कि क्या हम उनके विजयी मॉडल को अपनाना चाहते हैं।’
लेकिन कई पाकिस्तानियों की राय है कि तालिबान को समर्थन देकर पाकिस्तान खतरनाक खेल खेल रहा है। ‘तालिबानः मिलिटैंट इस्लाम, ऑयल एंड फंडामेंटलिज्म इन सेंट्रल एशिया’ नाम की किताब के लेखक अहमद रशीद ने द गार्जियन से कहा- ‘पाकिस्तान ने तालिबान को अपनी जमीन पर सक्रिय रहने की इजाजत दी है। मेरी राय में इसके बहुत गंभीर नतीजे होंगे। पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर उग्रवाद और कट्टरपंथ फैलने जा रहा है।’