जानकारों के मुताबिक अब यूएई अपने पुराने दुश्मनों से मेलमिलाप की नीति पर चल रहा है। इस सिलसिले में जिस देश ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है, वह टर्की है। दस साल पहले अरब स्प्रिंग (अरब देशों में जन प्रदर्शनों) के समय यूएई और टर्की के रिश्ते बहुत बिगड़ गए थे। तब टर्की ने मोरोक्को और सीरिया में बागी इस्लामी गुटों का समर्थन किया था, जबकि यूएई ने अपना समर्थन वहां के शासकों को दिया था। तब लीबिया में भी दोनों देश अलग-अलग गुटों के साथ थे।
यूएई टर्की के साथ विवादों में ग्रीस और साइप्रस का समर्थन करता रहा है। वह इस्राइल को अरब देशों की मान्यता दिलाने में जुटा रहा है, जबकि टर्की इसके सख्त खिलाफ है। 2017 में यूएई उन चार अरब देशों में शामिल हुआ, जिन्होंने टर्की के सहयोगी देश कतर की घेरेबंदी की। ये घेराबंदी इस साल जनवरी में जाकर हटाई गई है।
आपसी संबंधों में इतने पेंच होने के कारण ही उस समय पर्यवेक्षक हैरत में रह गए, जब अगस्त के मध्य में शेख तन्हून ने अंकारा जाकर टर्की के राष्ट्रपति रजिब तयिब आर्दोआन से भेंट की। तब आर्दोआन ने उम्मीद जताई थी कि भविष्य में यूएई से बड़ी मात्रा में निवेश टर्की आएगा। उसके बाद से दोनों देशों के नेताओं और राजनयिकों में कई मुलाकातें हुई हैं।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि यूएई की नीतियों में बदलाव से टर्की को अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाने में मदद मिल रही है। आर्दोआन टर्की को पूरी इस्लामी दुनिया के नेता बनाना चाहते हैं। पर्यवेक्षकों की निगाह अब यह देखने पर है कि इसमें यूएई कितना मददगार बनता है।