इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सैनिक शासन के खिलाफ लड़ाई बिखरे हुए सशस्त्र गुट चला रहे हैं। एनयूजी को उन्हें एकजुट करने और उन्हें अपने कमांड में लेने में कोई कामयाबी मिली है, इस बात के संकेत नहीं हैँ। कुछ गुटों ने एनयूजी के प्रति अपनी वफादारी का एलान जरूर किया है। उनमें कचिन, कयन और कयाह गुट शामिल हैं। इन तीनों गुटों ने सैनिक शासन का विरोध किया है। उधर शान और रखाइन प्रांतों में सक्रिय गुटों ने एनयूजी को मान्यता देने से इनकार कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि ज्यादातर गुटों की चिंता अपने प्रभाव वाले इलाकों की गतिविधियों तक सीमित है। जबकि एनयूजी लड़ाई को राष्ट्र-व्यापी संदर्भ देना चाहती है।
लशी ला ने सैनिक शासन नियंत्रित बॉर्डर गार्ड फोर्सेज और सभी अर्धसैनिक बलों से सरकार का साथ छोड़ कर जनता की तरफ से लड़ाई में शामिल होने की अपील भी की है। जानकारों का कहना है कि ऐसा सचमुच होगा, इसकी फिलहाल कोई संभावना नहीं दिखती है। लेकिन लशी ला के आह्वान को सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रियता मिली है। बुधवार तक उसे पांच लाख 58 हजार लोग देख चुके थे। 65 हजार से ज्यादा लोगों ने उसे लाइक किया, जबकि आठ हजार से ज्यादा कमेंट उस पर किए गए।
खबरों के मुताबिक लशी ला के आह्वान के बाद से यंगून की सड़कों पर सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है। मगर जानकारों का कहना है कि एनयूजी की अपील के मुताबिक देश में सैनिक शासन के खिलाफ कोई निर्णायक लड़ाई शुरू हो जाएगी, इसके कोई संकेत नहीं हैं। आम लोगों में फिलहाल सैनिक शासकों के दमन का भय गहराई तक समाया हुआ है।