इंडोनेशिया के विदेश मंत्री रेत्नो मरसुदी ने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा कि म्यांमार के बारे में आसियान में एक पांच सूत्री सहमति बनी थी। लेकिन उसको लेकर कोई खास प्रगति नहीं हो पाई। इसीलिए इस बार जनरल हलायंग को न बुलाने का फैसला लिया गया। बीते अप्रैल में आसियान ने आम सहमति से तय किया था कि वह अपना एक विशेष दूत म्यांमार भेजेगा, जो वहां सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करेगा। दूत के मध्य अक्टूबर में म्यांमार जाने का कार्यक्रम बना। लेकिन म्यांमार के सैनिक शासकों ने उसे विपक्षी नेता आंग सान सू ची से मिलने की इजाजत देने से इनकार कर दिया। सू ची अभी अपने घर में नजरबंद हैं।
लेकिन म्यांमार ने कहा है कि आसियान से फैसले से वहां स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। सैनिक शासन ने एक बयान में कहा- ‘म्यांमार आसियान के इस फैसले से निराश है और इस पर मजबूती से अपना एतराज जताता है। आसियान के विदेश मंत्रियों की आपात बैठक में चर्चा और ये फैसला बिना आम सहमति के हुआ।’
सिंगापुर के विदेश मंत्रालय के पूर्व स्थायी सचिव बिलहारी कौसिकन ने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा- ‘आसियान को ये फैसला अपनी साख बचाने के लिए लेना पड़ा। जो पांच सूत्री आम सहमति बनी थी, उसे लागू करवा पाने में ये समूह नाकाम रहा। उसके बाद उसे ये निर्णय लेना पड़ा।’
निक्कई एशिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि आसियान ने इस मामले में उभरे मतभेदों को चर्चा से दूर रखने की कोशिश की है, क्योंकि एकता ही इस समूह की ताकत रही है। इंडोनेशिया के विदेश मंत्रालय के अधिकारी अब्दुल कादिर जिलानी ने यह माना कि ये फैसला ‘अभूतपूर्व’ है। उन्होंने कहा कि म्यांमार की नुमाइंदगी का दावा सैनिक शासक और विपक्ष दोनों कर रहे थे। इसे और अ-हस्तक्षेप के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए गैर-राजनीतिक प्रतिनिधि को बुलाने का फैसला हुआ।