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अमेरिका: चौधरी बनने के चक्कर में वियतनाम, क्यूबा और सोमालिया से भी हट चुका है पीछे, अफगानी नागरिकों को छोड़ दिया भगवान भरोसे

Tue, 17 Aug 2021 02:05 PM IST
प्रतिभा ज्योति न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बीच अफगानिस्तान में पिछले 48 घंटे में जो हालात पैदा हुए हैं, उसे देखकर पूरी दुनिया अमेरिका को दोषी मान रही  है। अफगानी नागरिक चीख-चीख कर इसके लिए अमेरिका को जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। 
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अमेरिकी सेना - फोटो : US Army Twitter
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विस्तार
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अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बीच अफगानिस्तान में पिछले 48 घंटे में जो हालात पैदा हुए हैं, उसे देखकर पूरी दुनिया स्तब्ध है। अफगानिस्तान छोड़ने के लिए लोग अपनी-अपनी सरकारों से मदद की गुहार लगा रहे हैं। तालिबानियों को लेकर लोगों में खौफ इतना है कि एक विमान में 600 से ज्यादा लोग सवार होकर देश छोड़ रहे हैं। यहां तक कि राष्ट्रपति अशरफ गनी भी देश छोड़ चुके हैं। अफगानिस्तान की इस स्थिति के लिए सबसे ज्यादा दोष अमेरिका को दिया जा रहा है, क्योंकि अमेरिकी सेना की वापसी के तुरंत बाद से ही तालिबान ने अपना कब्जा जमाना शुरू कर दिया था। अफगानी नागरिक चीख-चीख कर इसके लिए अमेरिका को जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन अपने फैसले को सही ठहरा रहे हैं। अमेरिकी सैनिकों और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह फैसला जरूरी था। 
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अमेरिका का यह पुराना इतिहास रहा है कि वह खुद को महाशक्ति साबित करने के लिए पहले तो जरूरतमंद और संकट में फंसे देशों की ओर मदद का हाथ बढ़ाता है और बाद में हाथ खींच लेता है। अफगानिस्तान के साथ उसने जो किया ऐसे में लोगों को एक बार फिर वियतनाम, क्यूबा और सोमालिया से जुड़े उसके पुराने शर्मनाक किस्से याद आने लगे हैं। खुद को मुश्किल में फंसा देख सुपरपावर अमेरिका अफगानिस्तान की तरह ही इन देशों से अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर भाग खड़ा हुआ था। 

चलिए, इतिहास के पन्नों को पलट कर देखते हैं अमेरिकी सैनिक कैसे देश छोड़कर भागे थे

वियतनाम
यह अमेरिका की शर्मनाक हार की कहानी बयां करता है। हो चो मिन्ह वियतनाम के राजनेता था जो चीनी और सोवियत साम्यवाद से काफी प्रभावित था।  हो के कब्जे में उत्तरी वियतनाम रहा जबकि सम्राट बाओ डाई के कब्जे में दक्षिणी वियतनाम। 1955 में नो दिन डिएम नाम के नेता ने सम्राट बाओ का तख्तापलट कर दिया। वह वियतनाम गणराज्य की सरकार जिसे जीवीएन उस दौरान (दक्षिण वियतनाम) के नाम से जाना जाता था। अमेरिका दक्षिण वियतनाम के समर्थन में आ गया। दक्षिण वियतनाम की सहायता के लिए अपने सैनिक वहां भेजने शुरू कर दिए और उन्हें हथियार मुहैया कराए। अमेरिकी सेना की मदद से डिएम ने  हो चो मिन्ह की वियत मिन्ह (वियतनाम की आजादी के लिए बना संगठन) के विद्रोहियों को कुचलना शुरू किया। हालांकि अमेरिकी सेना 1954 में ही वहां पहुंच गई थी लेकिन 1960 तक उनकी संख्या नौ हजार हो गई। 
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नवंबर 1963 में डिएम के जनरलों ने बगावत करके उसकी सत्ता उखाड़ दी। अमेरिका को लगा यह सब उत्तरी वियतनाम के इशारों पर हो रहा है। उसने उत्तरी वियतनाम पर बमबारी करवाई। वियतनाम में अमेरिका ने अपने इस ऑपरेशन का नाम ऑपरेशन थंडर रखा। अमेरिका ने यहां अपने साढ़े चार लाख से ज्यादा सैनिक तैनात कर दिए। उत्तरी वियतनाम पर अमेरिका करीब 19 साल तक भीषण बमबारी करता रहा, बावजूद इसके वह उत्तरी वियतनाम को झुका नहीं सका।

1969 में रिचर्ड निक्सन राष्ट्रपति बने। उन पर अपने सैनिकों को वापस बुलाने का घरेलू दबाव पड़ा और उन्होंने वियतनाम से निकलने का फैसला किया। जनवरी 1973 में पेरिस में अमेरिका, उत्तरी वियतनाम और दक्षिण वियतनाम के बीच एक समझौता हुआ और अमेरिकी सेना वहां से निकल गई। फिर वही हुआ जो अफगानिस्तान में तालिबान ने किया। अमेरिकी सेना के निकलते ही  29 मार्च 1973 को उत्तरी वियतनाम ने दक्षिणी वियतनाम पर हमला कर दिया।  30 अप्रैल 1975 को कम्युनिस्ट वियतनाम की फौज साइगॉन (आज एकीकृत वियतनाम की राजधानी हो-ची-मिन) में घुस गई और वहां बचे हुए अमेरिकियों को खदेड़ दिया।
 
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फिदेल कास्त्रो - फोटो : independent
क्यूबा-
समय था जनवरी 1959 का। कम्युनिस्ट क्रांतिकारी फीदेल कास्त्रो ने क्यूबा के तानाशाह फुलगेन्सियो बतिस्ता की सत्ता छीन ली थी। कास्त्रों की सत्ता बनने के बाद क्यूबा में अमेरिकियों की संपत्ति जब्त की जान लगी। वे लैटिन अमेरिकी देशों में कम्यूनिस्ट क्रांति की बात करने लगे और अमेरिका का खुल कर विरोध जताने लगे। इस बात से अमेरिका चिढ़ गया और कास्त्रो के रूप में उसे अपना कट्टर दुश्मन नजर आने लगा। कहा जाता है कि अमेरिका ने कास्त्रों को 634 बार मारने की कोशिश की। 

अमेरिका ने ऐसे लोगों से संपर्क करना शुरू किया जो कास्त्रों की सत्ता बनने के बाद देश छोड़कर भागे थे। अमेरिका ने उन्हें हथियार और ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया। अमेरिकी सहायता पाकर 1200 से ज्यादा विद्रोही लड़ाकों ने क्यूबा के पिग्स की खाड़ी के रास्ते क्यूबा पर हमला कर दिया। क्यूबा की वायुसेना इस हमले के लिए पहले से तैयार थी। सेना ने उनकी नाव डुबो दी।

विद्रोही लड़ाकों पर वादे के मुताबिक समय पर हवाई मदद नहीं मिली। इस हमले में 100 लड़ाके मारे गए। 1100 लड़ाकों को पकड़ लिया गया। अब सोवियत संघ क्यूबा की मदद के लिए आगे बढ़ा। अमेरिकी ने मिसाइल नहीं हटाने पर परमाणु युद्ध की धमकी दे दी। आखिरकार किसी तरह दोनों के बीच समझौता हुआ और सोवियत संघ मिसाइल हटाने को तैयार हुआ। इस घटना से अमेरिका की बहुत जगहंसाई हुई थी।

सोमालिया
जनवरी 1991 में अफ्रीकी देश सोमालिया में हथियारबंद विद्रोही गुटों ने राष्ट्रपति मोहम्मद सियाद बरे की सत्ता उखाड़ फेंकी। सत्ता पाने के लिए सब एक-दूसरे से लड़न लगे। पूरे सोमालिया में सत्ता युद्ध छिड़ गया। मुख्य विद्रोही गुट यूनाइटेड सोमालिया कांग्रेस के भी दो फाड़ हो गए। एक गुट का नेता अली मेहदी मुहम्मद ने खुद को राष्ट्रपति घोषित कर लिया तो दूसरे गुट का नेतृत्व मोहम्मद फराह अदीदी करने लगा।

गृह युद्ध छिड़ने से आम लोगों की जिंदगी मुश्किल में फंस गई। लोगों की मदद क लिए यूनाइटेड नेशन्स ऑपरेशन इन सोमालिया-2 शुरू किया। लेकिन मोहम्मद फराह अदीदी का समूह यूनाइटेड नेशन की इस मदद का विरोध करने लगा। अदीदी पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने सेना की एक टास्क फोर्स भेजी। टास्क फोर्स भेजना अमेरिका की एक बड़ी गलती साबित हुई। विद्रोहियों ने अमेरिकी सेना के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी। उसके हेलिकॉप्टर गिरा दिए गए। दोनों तरफ से एक-दूसरे पर हमले शुरू हो गए। इस लड़ाई में 19 अमेरिकी सैनिक मारे गए। इतना ही नहीं विद्रोहियों ने अमेरिकी सैनिकों के शव की दुर्दशा कर दी। उनके शव सड़कों पर घसीटे गए। इसके बाद अमेरिका ने आम नागरिकों की मदद के अपने मिशन को वापस ले लिया।

 
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