तालिबान शब्द अफगानिस्तान में बोली जाने वाली पश्तो भाषा का शब्द है। यूनेस्को के अनुसार अफगानिस्तान के करीब 55 फीसदी लोगों की यही भाषा है। इस शब्द का असल अर्थ होता है विद्यार्थी। लेकिन आज यह शब्द खतरनाक आतंकी संगठन पर्याय बन चुका है। इसकी स्थापना कुख्यात आतंकी रहे मुल्ला उमर ने की थी। सितंबर 1994 में कंधार में उसने 50 लड़कों के साथ यह संगठन बनाया था। मुख्यत: पश्तून लोगों का यह आंदोलन सुन्नी इस्लामिक धर्म की शिक्षा देने वाले मदरसों से जुड़े लोगों ने खड़ा किया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक उस समय पाकिस्तान स्थित इन मदरसों की फंडिंग सऊदी अरब करता था।
तालिबान का खौफनाक कट्टरपंथी चेहरा तब दुनिया के सामने आया जब साल 2001 में उसके लड़ाकों ने मध्य अफगानिस्तान में स्थित प्रसिद्ध बामियान की बुद्ध मूर्तियों को बम से उड़ा दिया। इस वाकये की पूरी दुनिया में निंदा हुई थी। तालिबान के उभार के लिए पाकिस्तान को ही जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन वह इससे इनकार करता आया है। जो अफगानी शुरुआती दौर में तालिबानी आंदोलन में शामिल हुए, उनमें से ज्यादातर ने पाकिस्तानी मदरसों में शिक्षा पाई थी। पाकिस्तान उन तीन देशों में से भी एक है, जिन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान के शासन को मान्यता दी थी। अन्य दो देश सऊदी अरब और यूएई थे।