बाइडन ने कहा, हम आतंकवादियों के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। हम उन्हें हमारा अभियान रोकने नहीं देंगे। तुम्हे हम माफ नहीं करेंगे, ढूंढेंगे और सजा देंगे। कुछ विशेषज्ञों की मदद से हमने बायडन के इस इस बयान का मतलब निकालने की कोशिश की है, कि क्या अमेरिका आईएस-के खिलाफ उसी तरह का अभियान छेड़ेगा जैसा कि 9/11 के बाद अलकायदा के खिलाफ किया था।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
अमेरिका की प्रतिक्रिया का देर-सबेर दिखेगा असर
पूर्व विदेश सचिव शशांक ने अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में कहा- कल काबुल में जो हुआ है, उसके बाद अमेरिका ने वही प्रतिक्रिया दी है जो निश्चित तौर पर भारत भी देता। इसलिए अमेरिका की प्रतिक्रिया बहुत स्वाभाविक है और देर-सबेर इस का असर भी दिखेगा। तालिबान का काबुल पर कब्जा होने के बाद अमेरिका के अंदर पहले से अपने सैनिकों को जल्द वापस बुलाने का दबाव था और निश्चित रूप से कल की घटना के बाद यह दबाव बढ़ गया है।
इसलिए अभी अमेरिका की पहली कोशिश यह होगी कि वह इस निकासी अभियान को पूरा करे। इस काम में उसे तालिबान का ही सहयोग लेना पड़ेगा और वह तालिबान से यह कह सकता है कि दोहा समझौते के तहत अमेरिकी सैनिकों को निकलने में मदद करे। दूसरी तरफ जहां तक आईएस-के की बात है इसे भी सबक सिखाने के लिए अमेरिका को तालिबान की ही मदद लेनी होगी।
आईएस-के सिर्फ अफगानिस्तान ही नहीं बल्कि भारत और यूं कहें तो पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक बड़ी चुनौती बनेगा। लेकिन उसे मिटाने के लिए अमेरिका को तालिबान पर ही निर्भर करना पड़ेगा। तालिबान की मदद से ही उसे ठिकाने लगाया जा सकता है क्योंकि दोनों संगठनों में कट्टर दुश्मनी है। हो सकता है अपने दुश्मन को सबक सिखाने के लिए इसके लिए अमेरिका अफगानिस्तान में फिर से सक्रिय हो जाए।
साथ ही अमेरिका यह भी देखना चाहिए कि जो हथियार और उपकरण अफगानिस्तान में छूट गए हैं वह पाकिस्तान के हाथ न लग जाएं, क्योंकि कहा जा रहा है कि इन दिनों अफगानिस्तान की आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा हक्कानी ग्रुप के हाथों में है और पाकिस्तान कोशिश कर सकता है कि उसके जरिए अमेरिका के छोड़े गए हथियार और उपकरण वह हासिल कर ले। यदि ऐसा होता है तो भारत के लिए खतरा बढ़ सकता है।
अमेरिका के लिए बड़ा झटका, वह बदला जरूर लेगा
रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) का कहना है अमेरिकी सैनिकों और अय विदेशी नागरिकों को काबुल से बाहर निकालने के पहले जो धमाका हुआ है उससे अमेरिका को एक बड़ा झटका लगा है। 2011 में अमेरिका के चिनूक हेलिकॉप्टर को मार गिराने के बाद अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाए जाने की यह सबसे बड़ी घटना है। उस हमले में 30 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे। अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाकर दस साल के बाद इतना बड़ा हमला किया गया है। इसका मतलब है कि अमेरिका ने दोहा समझौते के तहत तालिबान पर जो भरोसा किया था वह थोड़ा हिला है।
अमेरिका के पास साफ तौर पर इंटेलिजेंस रिपोर्ट थी कि इस तरह का धमाका हो सकता है, लेकिन उसे तालिबान पर भरोसा था कि जिस हक्कान नेटवर्क के हाथों में अभी अफगानिस्तान की आंतरिक सुरक्षा है वह इस मामले को संभालेगा। लेकिन ऐसा लग रहा है कि तालिबान के बाद आईएस-के का आंतक शुरू हो गया है। इसलिए अमेरिका बदला जरूर लेगा, और इसके लिए वह सही समय पर वार करेगा। क्योंकि अमेरिका की प्राथमिकता अभी अपने सैनिकों और विदेशी नागरिकों को हटाने की है।
जैसे भारत ने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस बनाया हुआ है, अमेरिका भी अपने देश के लिए उसी नीति का पालन करता है। जैसे भारत ने पाकिस्तान पर बालाकोट और सर्जिकल स्ट्राइक किया था, उसी तरह आईएस-के को भी सजा देने के लिए अमेरिका कार्रवाई जरूर करेगा, क्योंकि पूरी दुनिया में अभी अमेरिका की सैन्य ताकत पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। किसी को गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि अमेरिका इसका जवाब देगा या नहीं, क्योंकि अफगानिस्तान ही नहीं पूरे दशिण एशिया में अभी बहुत हिंसा बढ़ेगी।
ये आतंकी संगठन पश्चिम देशों के सैनिकों को निशाना बनाने की कोशिश करेंगे। आईएस-के हो या हक्कानी नेटवर्क हो या फिर तालिबान इन सबको पाकिस्तान से खुराक मिलती है, इसलिए यदि अमेरिका पूरी दुनिया में शांति चाहता है तो आंतकी संगठनों को सबक सिखाने के साथ-साथ उसे पाकिस्तान पर भी लगाम कसनी चाहिए और आने वाली तालिबान सरकार को यह साफ संदेश देना चाहिए कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश की संप्रभूता को चोट पहुंचाने के लिए न करने दे।