संयुक्त राष्ट्र महासभा के 78वें सत्र को विदेश मंत्री जयशंकर ने संबोधित किया। जयशंकर ने संबोधन की शुरुआत इंडिया के बदले भारत का प्रयोग कर की। उन्होंने कहा, भारत की ओर से नमस्ते। करीब 17 मिनट लंबे अपने संबोधन में उन्होंने कहा, मैं उस समाज की ओर से बोल रहा हूं जहां के लोकतंत्र की प्राचीन जड़ें गहरे तक जमी हुईं हैं। इस कारण हमारी सोच, हमारी धारणा और हमारी ओर से उठाए गए कदम ज्यादा जमीन से जुड़े और प्रामाणिक हैं। वहीं जयशंकर ने उन देशों पर कटाक्ष किया जो पहले दुनिया का एजेंडा तय करते थे।
जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों को आतंकवाद, अतिवाद और हिंसा से निपटने के मामले में सुविधा की राजनीति को स्वीकृति नहीं देनी चाहिए। उन्होंने कहा, भौगोलिक अखंडता का सम्मान और किसी देश के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी का मामला चुनिंदा रूप से नहीं उठाया जा सकता। जयशंकर ने जोर दिया, कुछ देशों की ओर से एजेंडा सेट करने और बाकी से उसका पालन करने की उम्मीद करने के दिन लद गए। उन्हें दूसरों की बातें भी सुननी होंगी।
विदेश मंत्री जयशंकर के इस तल्ख भाषण को कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो और अमेरिकी अधिकारियों के बयान का जवाब माना जा रहा है। त्रूदो ने कनाडा में खालिस्तानी आतंकी निज्जर की हत्या के लिए भारत सरकार और उसके एजेंटों को जिम्मेदार ठहराया था, वहीं अमेरिका ने मामले में भारत को कनाडाई जांच में मदद करने के लिए कहा है। अमेरिका खुद अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बने लोगों को दुनिया के किसी भी देश में घुसकर मारता रहा है। ऐसे में जयशंकर का बयान उसे आईना दिखाने जैसा है। जयशंकर ने विश्व में समानता स्थापित करने पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा, सुनिश्चित करना चाहिए कि वैक्सीन रंगभेद जैसी अन्यायपूर्ण घटना फिर न हो। जलवायु एक्शन के मामले में भी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से छुटकारा पाने जैसी चीज नहीं हो सकती। इसी प्रकार बाजार की ताकत का इस्तेमाल भोजन व ऊर्जा का प्रवाह जरूरतमंदों से धनी लोगों की ओर करने के लिए नहीं होना चाहिए। जयशंकर ने कहा, भारत अलग-अलग साझेदारों के साथ सहयोग को बढ़ावा देना चाहता है। गुटनिरपेक्ष युग से निकलकर अब हमने विश्व मित्र की अवधारणा विकसित की है। यह विभिन्न देशों के साथ जुड़ने और जहां जरूरी हो, हितों में सामंजस्य स्थापित करने की हमारी क्षमता और इच्छा को दिखाता है।
संयुक्त राष्ट्र को सुधार करना ही होगा
उन्होंने कहा, सुरक्षा परिषद समेत संयुक्त राष्ट्र के सुधारों को अनिश्चितकाल व बिना चुनौती के नहीं टाला जा सकता। संयुक्त राष्ट्र को आधुनिक दौर में प्रासंगिक बनाए रखना है, तो सुधार करना ही होगा। हम नियम आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देने, संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन करने की बातें सुनते हैं। पर ये सब सिर्फ बातें हैं। आज भी कुछ देश एजेंडा सेट करते हैं। नियमों को परिभाषित करते हैं। ऐसा हमेशा नहीं हो सकता।
जी-20 में ऐतिहासिक सुधार से लें प्रेरणा
जी-20 में अफ्रीकी संघ को शामिल करने का उदाहरण देते हुए जयशंकर ने कहा, ऐसा कर हमने एक पूरे महाद्वीप की आवाज को वहां स्थान दिया। इससे संयुक्त राष्ट्र को भी प्रेरणा लेकर सुरक्षा परिषद में सुधार कर सामयिक बनाना चाहिए।
आपदा में सबसे पहले मदद देता है भारत
जयशंकर ने कहा, जी-20 में ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ का भारत का दृष्टिकोण महज कुछ देशों के संकीर्ण हितों पर नहीं, बल्कि कई राष्ट्रों की मुख्य चिंताओं पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करता है। हमने 75 देशों के साथ विकास की साझेदारी की है। किसी भी आपदा व आपात स्थिति में हम सबसे पहले मदद देने वाले देश हैं। तुर्किये व सीरिया के लोगों ने यह देखा है।
परंपरा और तकनीक को बराबर का स्थान
जयशंकर ने कहा, हमारी सभ्यतागत नीति आधुनिकता को गले लगाती है। हम परंपरा और तकनीक को बराबरी का स्थान देते हैं। यह मेल ही आज के इंडिया जो भारत है, को परिभाषित करती है।