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अल्जाइमर का खतरा कम करने वाले आनुवांशिक परिवर्तनों की हुई पहचान

Mon, 10 Feb 2020 05:13 AM IST
संजीव कुमार झा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
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शोधकर्ताओं ने अल्जाइमर रोग से रक्षा करने वाले आनुवंशिक  परिवर्तनों (जेनेटिक वेरिएंट्स) की पहचान की है। ताजा अध्ययन से पता चला है कि प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाले ये परिवर्तन टायरोसिन फॉस्फेटेस नामक प्रोटीन की क्रियाशीलता  घटा देते हैं। यह प्रोटीन ‘पीआई3के/एकेटी/जीएसके-3बी’ नामक कोशिका संकेतन (सेल सिग्नलिंग ) मार्ग  की गतिविधि को बाधित करने के लिए जाना जाता है। सेल सिग्नलिंग मार्ग कोशिकाओं के अस्तित्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है।  

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जर्नल एनल्स ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित ताजा शोध में टायरोसिन फॉस्फेटेस प्रोटीनों के कार्यों को रोककर पहली बार मानव में अल्जाइमर का जोखिम कम करने का प्रभाव देखा गया है। इससे पहले चूहों पर हुए शोध ने इस ओर इशारा किया था। प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर डेविड कर्टिस का कहना है कि  ताजा नतीजे काफी उत्साहित करने वाले हैं।

इनसे पता चला है कि जब प्राकृतिक आनुवांशिक परिवर्तन टायरोसिन फॉस्फेटेस प्रोटीनों की गतिविधि को कम करते हैं तो इससे अल्जाइमर विकसित होने का खतरा कम हो जाता है। इससे यह भी संकेत मिलते हैं कि जिन दवाओं से यह प्रभाव पैदा होता है, वे भी बचावकारी हो सकती हैं। 
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इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने 10,000 लोगों के डीएनए का विश्लेषण किया। इनमें आधे लोग अल्जाइमर से ग्रसित थे और आधे स्वस्थ थे। शोधकर्ताओं ने 15,000 से ज्यादा जीनों में डीएनए अनुक्रम के सभी परिवर्तनों को जांचा।

प्रोफेसर कर्टिस का कहना है कि लोगों में इस प्राकृतिक प्रयोग से अल्जाइमर के विकसित होने के बारे में पता चला है। हमने देखा कि जिन लोगों में खास आनुवांशिक परिवर्तन आए, उनमें अल्जाइमर होने का खतरा कम पाया गया। इस अध्ययन से वैज्ञानिकों को अल्जाइमर की प्रभावी दवा बनाने में भी मदद मिलेगी।  हालांकि, जिन लोगों में ‘पीआई3के’ सेल सिग्नलिंग के लिए जीन को नुकसान पहुंचाने वाले आनुवांशिक परिवर्तन होते हैं तो उनमें अल्जाइमर का खतरा बढ़ जाता है। 

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