फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बड़ी टेक कंपनियों पर लगाम: अमेरिका, यूरोप और चीन में से किसका मॉडल बेहतर?

Wed, 11 Aug 2021 04:53 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स

सार

यूरोप में जानकारों के एक हिस्से की राय है कि जहां तक प्राइवेसी जैसे मानव अधिकारों की रक्षा का सवाल है, यूरोप की बढ़त बनी रहेगी। इस मामले में उसका रिकॉर्ड अमेरिका से बेहतर है। इसलिए जहां भी कंपनियां लोगों के अधिकारों का हनन करेंगी, यूरोप अधिक चुस्ती से कदम उठाएगा...
विज्ञापन
यूरोपीय संघ - फोटो : pixabay
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

बड़ी टेक कंपनियों पर सख्त नियम लागू करने के मामले में यूरोप पिछड़ गया है। ये पहल सबसे पहले यूरोप में हुई थी, लेकिन अब इस मामले में अमेरिका और चीन आगे निकल गए हैं। जानकारों का कहना है कि यूरोप लंबे समय से बड़ी टेक कंपनियों पर निगरानी के मामले में खुद को सबसे आगे मानता था। लेकिन इस साल के बीते सात महीनों में अमेरिका और चीन में इस मामले में ज्यादा कदम उठाए गए हैं। खासकर चीन ने हाल में अपनी टेक कंपनियों के खिलाफ आक्रामक अंदाज में कार्रवाई की है। उधर अमेरिका में गूगल और फेसबुक कंपनियों के खिलाफ सरकार कोर्ट जाने की तैयारी में है। अमेरिका में इस मुद्दे पर दोनों प्रमुख पार्टियों में पूरी सहमति है कि इन कंपनियों पर लगाम लगाने की जरूरत है।

विज्ञापन


यूरोप में जानकारों के एक हिस्से की राय है कि जहां तक प्राइवेसी जैसे मानव अधिकारों की रक्षा का सवाल है, यूरोप की बढ़त बनी रहेगी। इस मामले में उसका रिकॉर्ड अमेरिका से बेहतर है। इसलिए जहां भी कंपनियां लोगों के अधिकारों का हनन करेंगी, यूरोप अधिक चुस्ती से कदम उठाएगा। लेकिन अब ताजा घटना यह हुई है कि अमेरिका और चीन भी टेक कंपनियों पर लगाम कसने की जरूरत महसूस करने लगे हैं। अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के साइबर पॉलिसी सेंटर के अंतरराष्ट्रीय निदेशक मारीत्जी शाके ने वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू से कहा- ‘आज की जो डिजिटल हकीकत है, उसे देखते हुए वैश्विक शक्तियां अपने कानूनों को सुधारने की जरूरत महसूस करेंगी, यह होना ही था। लेकिन मूल बात यह है कि ऐसे कदमों के पीछे उसूल और प्रतिमान क्या हैं। यही बात ऐसे कदमों का प्रभाव तय करेगी। डिजिटल युग में शासन की लोकतांत्रिक दृष्टि विकसित करने में यूरोप सबसे आगे है।’

Trending Videos
विज्ञापन

लेकिन आलोचकों का कहना है कि ऐसी ऊंची बातों से ये सच नहीं छिप सकता कि इस मामले में यूरोपियन यूनियन का रिकॉर्ड कमजोर है। यूरोप में डिजिटल एकाधिकार (मोनोपॉली) विरोधी सर्वोच्च अधिकारी मार्गरेट वेस्तागार ने एपल और अमेजन कंपनियों पर सख्त नियम लागू करने के लिए अभियान चलाया था। लेकिन उसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली। जबकि अमेरिका का फेडरल ट्रेड कमीशन फेसबुक पर पांच अरब यूरो का जुर्माना लगा चुका है। ये रकम ईयू ने अपने प्राइवेसी कानून के तहत टेक कंपनियों पर जो जुर्माना लगाया है, उससे पांच गुना ज्यादा है। साथ ही अमेरिका में जो बाइडन प्रशासन ने लीना खान को मोनोपॉली विरोधी संस्था का प्रमुख नियुक्त किया है, जो बड़ी टेक कंपनियों के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए मशहूर रही हैं। खबरों के मुताबिक लीना खान की नियुक्ति के बाद से बड़ी कंपनियों के अधिकारी परेशान हैं। वे उन्हें हटवाने के लिए जोरदार लॉबिंग कर रहे हैं।

उधर, चीन ने तो हाल में बड़ी टेक कंपनियों के खिलाफ लगभग जंग छेड़ रखी है। इसमें उसने अपने यहां की सबसे बड़ी कंपनी अलीबाबा तक को नहीं बख्शा है। लेकिन स्टेनफॉर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. शाके ने कहा- ‘चीन में बड़ी टेक कंपनियों पर जिस तरह लगाम लगाई गई है, उसके पीछे सरकारी सख्ती का नजरिया है। यूरोप या अमेरिका में वैसे उसूल नहीं हैं। इसलिए वहां वहां ऐसी कार्रवाई नहीं हो सकती।’ जानकारों का कहना है कि बड़ी टेक कंपनियों पर कार्रवाई की जरूरत आज दुनियाभर में महसूस की जा रही है। अब देखने की बात यह होगी कि इस लिहाज से किसका मॉडल अधिक प्रभावी साबित होता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें