अब ऑस्ट्रेलिया में चल रही चर्चाओं में उन दोनों दुर्घटनाओं का बार-बार हवाला दिया जा रहा है। ग्रीन पार्टी के नेता बॉब ब्राउन ने कहा है कि ताजा फैसले के बाद ऑस्ट्रेलिया परमाणु संयंत्र लगाने के करीब पहुंच गया है। उन्होंने कहा- ‘सरकार ने बहुत कायरतापूर्ण काम किया है। उसने बिना जनता को बताए फैसला कर लिया। उसे मालूम था कि लोग इस निर्णय का विरोध करेंगे।’
ऑस्ट्रेलिया सरकार के लिए मुश्किल विदेश संबंधों में भी आई है। ताजा समझौते से फ्रांस तो इस हद तक नाराज हुआ है कि उसने अमेरिका के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया से भी अपने राजदूत को वापस बुला लिया है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राजदूत वापस बुलाने का फैसले को बेहद सख्त कदम माना जाता है। उधर न्यूजीलैंड के विरोध से भी ऑस्ट्रेलिया के लिए मुश्किल हुई है।
न्यूजीलैंड उन चंद विकसित देशों में है, जिसके पास कोई परमाणु संयंत्र नहीं है। उसने शून्य परमाणु क्षेत्र की नीति अपना रखी है। इस नीति के तहत वह उन जहाजों को अपने जल क्षेत्र में आने की इजाजत नहीं देता, जिन पर परमाणु हथियार या रेडियो एक्टिव पदार्थों लदे हुए हों। न्यूजीलैंड ने कहा है कि वह ऑस्ट्रेलियाई परमाणु पनडुब्बियों को अपने जल क्षेत्र में नहीं आने देगा। न्यूजीलैंड अमेरिकी नेतृत्व वाले फाइव आई गठबंधन का हिस्सा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने इस गठबंधन में ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। लेकिन ताजा त्रिपक्षीय समझौत का न्यूजीलैंड ने जोरदार विरोध किया है। इससे ऑस्ट्रेलिया में परमाणु विरोधी संगठनों को बल मिला है।