विशेषज्ञों की राय
प्रोफेसर अल-ओस्ता ने कहा, जब तक किसी व्यक्ति में टाइप वन डायबिटीज (टी1डी) का पता चलता है, तब तक इंसुलिन बनाने वाले उसकी बहुत सारी पैंक्रियाज बीटा कोशिकाएं नष्ट हो चुकी होती हैं। प्रोफेसर अल-ओस्ता के मुताबिक, डायबिटीज ग्रस्त पैंक्रियाज इंसुलिन नहीं बना पाता। मरीजों को रोज इंसुलिन का इंजेक्शन लेने पर निर्भर होना पड़ता है। इसका एकमात्र प्रभावी विकल्प पैंक्रियाटिक आइलेट ट्रांसप्लांट है। इससे डायबिटीज के मरीजों की सेहत के लिए नतीजे तो बेहतर मिले हैं। लेकिन ट्रांसप्लांट किसी द्वारा दान पर निर्भर करता है, इसलिए इसका ज्यादा प्रयोग नहीं हो पा रहा है।
ऑस्ट्रेलिया में औसतन सात बच्चे पीड़ित
सिर्फ ऑस्ट्रेलिया में ही हर रोज औसतन सात बच्चों में डायबिटीज का पता चलता है, जिसके कारण उन्हें नियमित रूप से खून की जांच और इंसुलिन के इंजेक्शन पर निर्भर रहना पड़ता है, क्योंकि उनका पैंक्रियाज ठीक तरह से काम नहीं कर पाता। इसके कारण इंसुलिन बनने में समस्या आती है।
क्या है इंसुलिन
इंसुलिन हमारे शरीर के लिए बहुत उपयोगी है। इंसुलिन के जरिए ही खून में, कोशिकाओं को शुगर मिलती है यानी इंसुलिन शरीर के अन्य भागों में शुगर पहुंचाने का काम करता है। इंसुलिन द्वारा पहुंचाई गई शुगर से ही कोशिकाओं को ऊर्जा मिलती है। इसलिए डायबिटीज के रोगियों को इंसुलिन की अतिरिक्त खुराक दी जाती है।