नए सामाजिक आधार तलाश रही है भाजपा
भाजपा को लंबे समय तक सत्ता में रहना है तो उसे अपने परंपरागत सिद्धांतों और सामाजिक आधार को बदलना होगा। डॉ. आनंद कुमार बताते हैं, भाजपा अब इसी लाइन पर चल रही है। मंत्रिमंडल विस्तार में इसकी झलक देखने को मिली है। उसके बाद पिछड़ा वर्ग को मेडिकल में आरक्षण भी उसी बदलाव का हिस्सा है। भाजपा को अब यह समझ आ रहा है कि पुराने सिद्धांतों और कार्यक्रमों में दरार आ रही है। यही वजह है कि पार्टी को अब नए सामाजिक आधार तलाशने पड़ रहे हैं। पेगासस, इस मुद्दे को आम लोग नहीं समझ रहे हैं। विपक्षी दल, पेगासस को लेकर संसद नहीं चलने दे रहे हैं, लेकिन इसका राजनीतिक फायदा उन्हें नहीं मिलेगा। वह इसलिए कि लोग पेगासस के बारे में ज्यादा नहीं जानते। वे इतना जानते हैं कि राजा कोई भी हो, ऐसे हथकंडे अपनाता है। चाणक्य नीति में इस तरह की अनेकों बातें पढ़ने को मिल जाएंगी। लोगों को किसानों का मुद्दा पता है, महंगाई के बारे में जानते हैं, दवा, शिक्षा और बेरोजगारी की समस्या से वे जूझ रहे हैं। भाजपा को अब ऐसे मसलों पर नोटिस करना होगा। इन्हें अब दरकिनार नहीं किया जा सकता।
विरोधी दलों के पास भावना तो है, लेकिन सीमेंट नहीं है...
विपक्ष, जिसने साइकिल यात्रा में भाग लिया है, उसके पास भावना तो है, लेकिन 'सीमेंट' नहीं है। वह सीमेंट जो विपक्ष में एक मजबूत जोड़ लगा सके। ऐसा जोड़ जो चुनाव तक सभी को साथ ले जाए। अभी तो महज एक सुगंध है। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी की भारी विजय के बाद भी विपक्षी एकता का मैसेज नहीं गया। क्योंकि चुनाव के दौरान विपक्षी एकता लोगों की नजरों में नहीं आई। अगर विपक्ष को जनता का आशीर्वाद नहीं मिलता है तो साइकिल यात्रा के कोई मायने ही नहीं है। इसके लिए पूरे देश में साझा कार्यक्रम चलाना होगा। आमजन को उनके पास जाकर 'विपक्षी साइकिल यात्रा' का मतलब समझाना पड़ेगा।
लुटियन की बजाए मोहल्लों में जब साइकिल यात्रा पहुंचेगी, तभी लोगों को विपक्षी एकता पर भरोसा होगा। चाय-नाश्ते के अलावा 'विपक्षी' धर्म का पालन करना होगा। ऐसा नहीं है कि एक वीडियो बनवाकर चुप बैठ गए। इससे जनता में कोई संदेश नहीं जाएगा। यूपी में गठबंधन का अच्छा इतिहास नहीं रहा। कांग्रेस को अपनी परंपरागत दावेदारी छोड़नी होगी, सपा उसकी बात कितना मानेगी, ये बैठ कर तय करना पड़ेगा। क्षेत्रीय पार्टियां कितना पीछे हटेंगी, ये बातें बहुत अहम हैं। दावत पर एकता निर्माण तो ठीक है, लेकिन इसकी सार्थकता तो तभी मालूम होगी, जब ये सब लोग एक साथ आमजन के पास जाएंगे। असल एकता का निर्माण तो लोगों के बीच होगा। वहां जाने के लिए विपक्ष को साझा कार्यक्रम तय करना पड़ेगा।