जानकारों का कहना है कि ईटीएस के कारण ईयू क्षेत्र में कोयला से बिजली बनाना गैस संचालित बिजली संयंत्रों की तुलना में महंगा रहा है। लेकिन ये सूरत इस साल जुलाई में बदल गई। बैंक ऑफ अमेरिका के एक विश्लेषण के मुताबिक अब हालत यह है कि कोयला से बिजली बनाना सस्ता हो गया है। इसकी वजह से ब्रिटेन ने जैसे देशों ने अपने यहां ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव किया है। ब्रिटेन इस समय बिजली की कमी का सामना कर रहा है। आशंका है कि सर्दियों में ये कमी और गंभीर रूप ले लेगी।
जर्मनी ने भी कोयला संचालित संयंत्रों से मुक्ति पाने की अपनी समयसीमा बढ़ा दी है। बल्कि जर्मनी में अब लिग्नाइट का उपयोग भी बढ़ गया है, जबकि इससे अधिक मात्रा में होने वाले उत्सर्जन के कारण पहले इससे मुक्ति पाने का फैसला किया गया था। जर्मन संस्था आईएसई फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक इस साल की तीसरी तिमाही में जर्मनी लिग्नाइट और कोयले से 35.1 टेरावॉट बिजली बनी, जबकि दूसरी तिमाही में इनसे 28 टेरावॉट का उत्पादन ही हुआ था। नीदरलैंड्स में भी अब कोयला का चलन बढ़ने के संकेत हैं।
गैर-सरकारी पर्यावरणवादी संस्था वर्ल्ड वाइड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) से जुड़े विश्लेषक डेव जोन्स ने यूरो न्यूज से कहा- ‘उत्सर्जन को लेकर रूझान अब गलत दिशा में है।’ इस बीच ऊर्जा संकट झेल रहे देशों में ईयू के ईटीएस के प्रति नाराजगी बढ़ने लगी है। वहां इसे ही मौजूदा संकट के लिए दोषी ठहराया जा रहा है।