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क्या होगा कार्बन शून्यता के लक्ष्य का: ऊर्जा संकट के बीच यूरोप में लौटने लगा कोयले का दौर

Wed, 13 Oct 2021 07:05 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स

सार

जलवायु परिवर्तन रोकने के मकसद से संयुक्त राष्ट्र की अगली बैठक कॉप-26 (संबंधित पक्षों का 26वां सम्मेलन) नवंबर में स्कॉटलैंड के शहर ग्लासगो में होगी। उसे देखते हुए ईयू बड़े प्रदूषक देशों को कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था...
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यूरोपीय संघ - फोटो : pixabay
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विस्तार
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प्राकृतिक गैस की कीमत में लगातार इजाफे की वजह से यूरोप में कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्रों का दौर लौटता दिख रहा है। जानकारों का कहना है कि बड़ी मुश्किल से यूरोप में इस बात पर सहमति बनी थी कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए ताप बिजली से मुक्ति पाना जरूरी है। लेकिन जिस तरह का संकट अभी इस पूरे महाद्वीप में पैदा हुआ है, उससे ये सहमति टूटने के संकेत हैं।

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टीवी चैनल यूरो न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूरोप में इस समय कोयले का दाम भी बढ़ा है। लेकिन ये बढ़ोतरी गैस की कीमत से कम है। इसके अलावा यूरोपियन यूनियन (ईयू) का एक नियम है, जिसके तहत जो देश कार्बन का जितना उत्सर्जन करते हैं, उन्हें उस हिसाब से कीमत चुकानी पड़ती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक ईयू के इस नियम यानी इमिशन (उत्सर्जन) ट्रेडिंग सिस्टम (ईटीएस) का आधार मूल्य इस साल के आरंभ की तुलना में दो गुना हो चुका है। कोयले की कीमत भी दोगुनी हो गई है। लेकिन गैस की कीमत इस साल के आरंभ की तुलना में इस समय चार गुना ज्यादा है।

जलवायु परिवर्तन रोकने के मकसद से संयुक्त राष्ट्र की अगली बैठक कॉप-26 (संबंधित पक्षों का 26वां सम्मेलन) नवंबर में स्कॉटलैंड के शहर ग्लासगो में होगी। उसे देखते हुए ईयू बड़े प्रदूषक देशों को कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था। कार्बन गैसों के उत्सर्जन को रोकने के लिए ईयू के पास सबसे प्रभावी उपाय ईटीएस ही है। इसके तहत किसी देश में मौजूद बिजली संयंत्रों और फैक्टरियों से कार्बन गैसों का जितना उत्सर्जन होता है, उसके अनुपात में ईयू उनसे शुल्क वसूल करता है।

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जानकारों का कहना है कि ईटीएस के कारण ईयू क्षेत्र में कोयला से बिजली बनाना गैस संचालित बिजली संयंत्रों की तुलना में महंगा रहा है। लेकिन ये सूरत इस साल जुलाई में बदल गई। बैंक ऑफ अमेरिका के एक विश्लेषण के मुताबिक अब हालत यह है कि कोयला से बिजली बनाना सस्ता हो गया है। इसकी वजह से ब्रिटेन ने जैसे देशों ने अपने यहां ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव किया है। ब्रिटेन इस समय बिजली की कमी का सामना कर रहा है। आशंका है कि सर्दियों में ये कमी और गंभीर रूप ले लेगी।

जर्मनी ने भी कोयला संचालित संयंत्रों से मुक्ति पाने की अपनी समयसीमा बढ़ा दी है। बल्कि जर्मनी में अब लिग्नाइट का उपयोग भी बढ़ गया है, जबकि इससे अधिक मात्रा में होने वाले उत्सर्जन के कारण पहले इससे मुक्ति पाने का फैसला किया गया था। जर्मन संस्था आईएसई फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक इस साल की तीसरी तिमाही में जर्मनी लिग्नाइट और कोयले से 35.1 टेरावॉट बिजली बनी, जबकि दूसरी तिमाही में इनसे 28 टेरावॉट का उत्पादन ही हुआ था। नीदरलैंड्स में भी अब कोयला का चलन बढ़ने के संकेत हैं।

गैर-सरकारी पर्यावरणवादी संस्था वर्ल्ड वाइड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) से जुड़े विश्लेषक डेव जोन्स ने यूरो न्यूज से कहा- ‘उत्सर्जन को लेकर रूझान अब गलत दिशा में है।’ इस बीच ऊर्जा संकट झेल रहे देशों में ईयू के ईटीएस के प्रति नाराजगी बढ़ने लगी है। वहां इसे ही मौजूदा संकट के लिए दोषी ठहराया जा रहा है।
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