परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर दुनिया में कई तरह की अवधारणाएं सामने आईं। तमाम परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए कई संधियां भी हुईं, लोगों में खौफ पैदा किया गया कि परमाणु हथियार अगर आतंकियों के हाथ पड़ गए तो क्या होगा? शीत युद्ध का पुरा युग ही इस डर में बीता कि फलां देश सामूहिक विनाश के हथियारों का इस्तेमाल करने जा रहा है। लेकिन अभी तक तमाम आशंकाएं परोक्ष रूप से निराधार ही साबित हुई हैं और उम्मीद है आगे भी रहेंगी। माओ त्से-तुंग ने अगस्त 1946 में कहा था, 'परमाणु बम एक 'कागजी शेर' है, जिसका इस्तेमाल संयुक्त राज्य अमेरिका के दुश्मन लोगों को डराने के लिए करते हैं।'
हालांकि, चीनियों ने खुद को 1964 में परमाणु बम विस्फोट करने से नहीं रोका और परमाणु क्षमता विकसित करने को प्राथमिकता दी। चीन ये जानता है कि परमाणु हथियारों का खौफ दिखा कर आप खुद को तो सुरक्षित रख सकते हैं, लेकिन सुपर पावर नहीं बन सकते। यही वजह है कि चीन अब साइबर युद्ध और इनफॉरमेशन वारफेयर की तरफ फोकस कर रहा है। डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस रह चुके रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पीआर कुमार कहते हैं, प्रतिरोध का वास्तविक हथियार यानी 'परमाणु हथियार क्षमता' भी अपनी चमक खो चुके हैं।
हाल ही में एक खबर को लेकर दुनियाभर के सैन्य विशेषज्ञों में खलबली मच गई है। चीन ने 2015 में गठित की गई स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स (PLASSF) को खत्म कर दिया है, और इसकी जगह इंफोर्मेशन सपोर्ट फोर्स (PLAISF) बनाई है, जो खासतौर पर स्पेस वार के साथ साइबर वारफेयर से जु़ड़ी चुनौतियों पर भी ध्यान देगी। 2015 में चीन ने साइबर, अंतरिक्ष, राजनीतिक और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से निपटने के लिए स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स का गठन किया था। लेकिन पिछले हफ्ते शुक्रवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसकी जगह इंफोर्मेशन सपोर्ट फोर्स के गठन का एलान करते हुई नई फोर्स को मिलिट्री झंडा भी सौंपा, जो सैन्य हलकों में बहुत बड़ी बात है। चीनी रक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि एरोस्पेस और साइबर यूनिट पहले स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स का हिस्सा थीं, लेकिन अब ये इंफोर्मेशन सपोर्ट फोर्स का हिस्सा होंगी।
सभी सेनाओं को इसे जल्द से जल्द अपनाने की जरूरत
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा कॉर्डिनेटर और साइबर सिक्योरिटी एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल राजेश पंत (सेवानिवृत्त) कहते हैं कि जब दुनिया जमीनी युद्ध, हवाई युद्ध और समुद्री युद्ध में उलझी है, ऐसे में हाल ही में चीनी सेना में हुए नए रिफॉर्म दर्शाते हैं कि चीन अपनी युद्धक शक्ति को बढ़ाने में सूचना और नेटवर्क की भूमिका को कितना महत्व दे रहा है। यह सूचना युग है और सभी सेनाओं को युद्ध के इस नए डोमेन को शीघ्रता से अपनाने की आवश्यकता है।
रक्षा मामलों के जानकार रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कहते हैं कि चीन ने 1993 में ही इस पर अमल करना शुरू कर दिया था। 2003 में ही चीन ने लीगल वारफेयर, साइबर वारफेयर और इनफॉरमेशन वारफेयर में अपनी पकड़ बना ली थी। बाकी देश भी अब इसमें धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान की इंटरसर्विस पब्लिक रिलेशंस (ISPR) को भी इसमें महारत हासिल है। यूक्रेन वॉर में भी नैरेटिव बनाने में इसका खूब इस्तेमाल किया जा रहा है।
'इनफॉर्मेटाइजेशन से इंटेलिजेनटाइजेशन' की तरफ जा रहा है चीन
साइबर वारफेयर एक्सपर्ट रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा कहते हैं कि इसे दूसरे नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। लगातार युद्ध रणनीति में हो रहे बदलावों को देखते हुए ही चीनी सेना संरचनात्मक सुधारों का निरंतर परीक्षण कर रही है। वह कहते हैं कि साइबर, स्पेस, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और इनफॉरमेशन वॉरफेयर का एकीकरण करना अच्छी पहल है। रिटायर्ड मेजर जनरल डॉ. मनदीप सिंह के मुताबिक पुरानी स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स और नई इंफोर्मेशन सपोर्ट फोर्स में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसे तकनीकों को देखते हुए अब चीन 'इनफॉर्मेटाइजेशन से इंटेलिजेनटाइजेशन' की तरफ जा रहा है। हाल ही में हुए यूक्रेन, इस्राइल युद्धों ने चीन को ऐसा करने के लिए मजबूर किया है। हालांकि वह इतनी आसानी से बदलाव नहीं करता है, इसके लिए काफी बहस और ट्रायल्स भी किए होंगे। वह कहते हैं कि भविष्य में चीन का फोकस अब अंतरिक्ष होगा, यानी कि वह सैटेलाइट्स पर नजर रखेगा, क्योंकि वर्तमान में यह कम्यूनिकेशन का बेहतरीन जरिया है। चीनी कमांडर इनफॉरमेशन प्रोसेसिंग टाइम को 85 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी करना चाहते हैं और यही वजह है कि इंफोर्मेशन सपोर्ट फोर्स को गठन किया गया है।
परमाणु हथियारों के इस्तेमाल में जोखिम ज्यादा
डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस रह चुके रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पीआर कुमार कहते हैं, वे इस बात को काफी दिनों से कह रहे हैं कि अभी पूरी दुनिया में मशहूर प्रतिरोध के वास्तविक हथियार यानी 'परमाणु हथियार' भी अपनी चमक खो रहे हैं। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा भी उनकी बात को समर्थन देते हैं। वह कहते हैं कि हाल के युद्धों ईरान बनाम यूएस/यूके/इस्राइल, इस्राइल-हमास युद्ध, यूक्रेन-रूस युद्ध या फिर फिलीपींस-चीन तनाव, कहीं भी प्रतिशोध के तौर पर 'परमाणु हथियार' का इस्तेमाल नहीं हुआ, हालांकि धमकी जरूर दी गई। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि परमाणु हथियार विनाश का प्रतीक हैं, जिसमें जोखिम ज्यादा हैं। इनका इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब आपसी संघर्ष नियंत्रण से बाहर हो जाए। लेकिन उसके इस्तेमाल के बाद अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की तरफ से लगने वाले कड़े प्रतिबंधों के लिए भी तैयार रहना होगा। जो लोग बार-बार परमाणु हथियारों की धमकी देते हैं, उन्हें दुनिया अच्छी नजरों से नहीं देखती है।
क्या है इनफॉरमेशन सपोर्ट फोर्स?
पीएलए प्रवक्ता वू कियान के मुताबिक, एयरोस्पेस फोर्स, साइबरस्पेस फोर्स और संयुक्त लॉजिस्टिक सपोर्ट फोर्स के साथ इनफॉरमेशन सपोर्ट फोर्स (PLAISF) पीएलए की नई शाखा है। इससे पहले, पीएलए स्पेस, साइबर और नेटवर्क क्षमताओं को एक साथ जोड़ कर स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स (PLASSF) बनाई गई थी। इसके अलावा, PLA ज्वाइंट लॉजिस्टिक्स सपोर्ट फोर्स (JLSF) एक अतिरिक्त स्वतंत्र इकाई थी, जो सभी पांच थिएटर कमांडों को रणनीतिक लॉजिस्टिक्स मदद देती थी। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक आईएसएफ पीएलए संचार नेटवर्क और नेटवर्क रक्षा के लिए जिम्मेदार होगी। इससे पहले पीएलए की इनफॉरमेशन कम्यूनिकेशंस बेस (ICB) स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स के तहत ये जिम्मेदारी संभालती थी। इनफॉरमेशन सपोर्ट फोर्स अब साइबर युद्ध के अलावा, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGNIT) भी नियंत्रित करेगा, दुश्मन के कमांड और नियंत्रण सिस्टम को हैक करने के साथ, उसके कंप्यूटर नेटवर्क पर अटैक करेगा और संचार और सैटेलाइट नेविगेशन को भी जाम करेगा।
2019 के चीन के रक्षा श्वेत पत्र में PLASSF के बारे में कहा गया था कि यह चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों और नई लड़ाकू क्षमताओं के विकास में अहम योगदान देगी। स्पेस सिस्टम्स डिपार्टमेंट और नेटवर्क सिस्टम्स डिपार्टमेंट इसका प्रमुख हिस्सा होंगे और चीनी सेना की अंतरिक्ष क्षमताओं को मजबूत करेगी, जिसमें संचार, नेविगेशन और पोजिशनिंग, खुफिया, निगरानी, टोही, और सैन्य सूचना की सुरक्षा शामिल है। वहीं 2023 में, हाइपरसोनिक हथियारों, टोही गुब्बारों और निगरानी ड्रोनों को भी स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स में शामिल किया गया। स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स के बारे में कहा जाता है कि 2022 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सर्वर पर हुआ साइबर अटैक, 2021 में मुंबई में ब्लैकआउट (पावर-ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर में मैलवेयर के कारण), ये सभी इसी फोर्स का काम था।
क्या होगा इन बदलावों का असर?
चीनी राष्ट्रपति सी जिनपिंग का विजन है कि 2047 तक चीनी सेना को अत्याधुनिक बनाया जाए। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक अंतरिक्ष अभियानों को एयरोस्पेस फोर्स को सौंपा जाएगा, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक, साइकोलॉजिकल वारफेयर को साइबरस्पेस फोर्स को सौंपा जाएगा। वहीं युद्ध के हालात में सूचना और संचार इंफोर्मेशन सपोर्ट फोर्स का हिस्सा होंगे। वहीं जेएलएसएफ अपने लॉजिस्टिक सपोर्ट जैसी जिम्मेदारियों को जारी रखेगी।
क्यों किए गए ये बदलाव?
अभी तक जो कहा जा रहा कि इन बदलावों के पीछे चीनी सेना में होने वाला भ्रष्टाचार है। 2015 में चीनी सेना में शी जिनपिंग ने जो बदलाव किए थे, उसके पीछे भी यही वजह थी। जानकारों का कहना है कि 2023 में पीएलए की रॉकेट फोर्स और स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे, जिसके बाद चीन के तत्कालीन रक्षा मंत्री ली शांगफू गायब हो गए थे। ली शांगफू को पिछले साल अक्तूबर में बिना किसी स्पष्टीकरण के उन्हें पद से हटा दिया गया था। जानकार यह भी कहते हैं कि भ्रष्टाचार के चलते ही पीएलए काफी समय से साइबर ऑपरेशंस, इंटेलिजेंस सपोर्ट जैसे मामलों में पिछड़ रही थी, जिसके चलते ये रिफॉर्म्स किए गए।
वहीं कहा यह भी जा रहा है कि 1991 में खाड़ी युद्ध के बाद से ही अन्य युद्धों से सीखते हुए चीनी सेना नई मिलिट्री तकनीक पर जोर देने लगी थी। रूस-यूक्रेन युद्ध और इस्राइल-फिलिस्तीन संघर्ष से भी चीनी सेना ने कई सबक सीखें हैं कि जैसे एडवांस टेक्नोलॉजी और क्विक रिएक्शन टाइम की कितनी अहमियत होती है। जिसके बाद चीनी मिलिट्री लीडरशिप ने फोर्स के डिसेंट्रलाइजेशन पर फोकस किया ताकि सेना तेजी से हमले कर सके।