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अफगानिस्तान की हालतः जुबानी जोश से छिप नहीं पाई हैं चीन की चिंता

Wed, 08 Sep 2021 03:11 PM IST
अजय सिंह वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग

सार

पर्यवेक्षकों के मुताबिक अफगानिस्तान की घटनाओं के बहाने चीन यह संदेश देने में जुटा रहा है कि अब अमेरिकी साम्राज्य का अंत निश्चित है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि घटनाएं जो मोड़ ले रही हैं, उनसे चीन के लिए भी खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है।
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चीन के विदेश मंत्री वांग यी और तालिबान का राजनीतिक चेहरा मुल्ला अब्दुल गनी बरादर (बाएं)। - फोटो : Social Media
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विस्तार
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अफगानिस्तान में अमेरिका की हुई फजीहत पर भले चीन सार्वजनिक तौर पर खुशी जता रहा हो, लेकिन ऐसे तमाम संकेत हैं, जिनसे पता चलता है कि तालिबानी राज को लेकर उसकी चिंता गहरा रही है। काबुल पर तालिबान का कब्जा होने के बाद चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने कहा था कि इसके साथ ही अमेरिकी मिथक का खात्मा हो गया है।

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लेकिन अब चीन को दो बातों की चिंता सता रही है। पहली तो यह है कि तालिबान के राज में अफगानिस्तान आतंकवाद पनपने का अड्डा बन सकता है, जिसका नतीजा चीन को भी भुगतना होगा। चीन की दूसरी चिंता यह है कि अफगानिस्तान की चिंता से मुक्त होने के बाद अब अमेरिका चीन से चल रहे टकराव पर अपना ध्यान केंद्रित करने की बेहतर स्थिति में पहुंच गया है। चीनी अधिकारियों ने मीडियाकर्मियों से निजी बातचीत में अपने देश की ये चिंताएं व्यक्त की हैं।

खबरों के मुताबिक अंदरूनी तौर पर चिंतित होने के बावजूद चीन ने अफगानिस्तान को बहाना बना कर अमेरिका के खिलाफ प्रचार अभियान जारी रखा है। पिछले दिनों चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने एक टिप्पणी प्रसारित की, जिसमें कहा गया कि ‘अमेरिकी साम्राज्य की आखिर शाम’ ढल चुकी है। चीन के विदेश मंत्रालय कह चुका है कि ‘अमेरिका के गैर-जिम्मेदार सैन्य दुःसाहसों’ के लिए यह एक सबक है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने कहा था- ‘अमेरिका जहां भी जाता है, वहां हम उथल-पुथल, विभाजन, बिखरे परिवारों, मृत्यु और जख्मों का नजारा देखते हैँ।’
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पर्यवेक्षकों के मुताबिक अफगानिस्तान की घटनाओं के बहाने चीन यह संदेश देने में जुटा रहा है कि अब अमेरिकी साम्राज्य का अंत निश्चित है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि घटनाएं जो मोड़ ले रही हैं, उनसे चीन के लिए भी खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है। दक्षिण कोरिया के यूनिवर्सिटी ऑफ सिओल में चीनी अध्ययन के प्रोफेसर जॉन देलुरी ने एक अमेरिकी टीवी चैनल से कहा- ‘9/11 (11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमलों) के बाद से अमेरिका आतंकवाद के मुकाबले और लगातार चल रहे युद्धों को जीतने में जुटा हुआ था। अब अफगानिस्तान से सैनिक वापसी अमेरिका के लिए चाहे जैसी ट्रैजेडी हो और उसका चाहे जैसा अपमान हुआ, लेकिन अब वह चीन से होड़ पर ध्यान केंद्रित करने में अधिक सफल होगा। यह चीन के लिए एक जोखिम भरी बात है।’

जानकारों के मुताबिक चीन को भरोसा अपने पुराने सहयोगी पाकिस्तान पर है। पाकिस्तान का तालिबान से पुराना रिश्ता है। जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में मौजूद सोवियत सेना के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी, तब उसने पाकिस्तान का खूब इस्तेमाल किया था। अमेरिकी थिंक टैंक जर्मन मार्शल फंड में सीनियर फेलॉ एंड्र्यू स्मॉल ने अमेरिकी टीवी चैनल एनबीसी से कहा- ‘तालिबान की जीत उसे पनाह देने और समर्थन देने की पाकिस्तान की नीति का परिणाम है। लेकिन इससे पाकिस्तान के अंदर मौजूद उग्रवादी गुटों में भी नया जोश आएगा, जो वहां अपने हमले बढ़ा सकते हैँ।’ जानकारों के मुताबिक इसकी आंच चीन तक पहुंच सकती है। 

पर्यवेक्षकों के मुताबिक ऐसी तमाम संभावनाओं के कारण चीन संभल कर चल रहा है। चीन की सिंगहुआ यूनिवर्सिटी में नेशनल स्ट्रेटेजी इंस्टीट्यूट में रिसर्च डायरेक्टर चियान फेंग ने कहा है कि अफगानिस्तान की घटनाओं से चीन के अपने राष्ट्रीय हित जुड़े हैं। उन्होंने कहा- ‘हमारे नेतृत्व का नजरिया विवेकपूर्ण है। इसलिए हम अमेरिकी रास्ते पर चलते हुए गलतियां नहीं करेंगे।’ इसका अर्थ यह समझा गया है कि चीन अपनी फौज अफगानिस्तान में तैनात नहीं करेगा। लेकिन अफगानिस्तान में स्थिति बिगड़ी तो उसके परिणामों से चीन पूरी तरह बच जाएगा, जानकार इससे सहमत नहीं हैँ। 

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