ISS से शुभांशु शुक्ला की वापसी: पृथ्वी पर चलने-देखने तक में होगी दिक्कत, सहारे की पड़ेगी जरूरत; जानें क्यों
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 15 Jul 2025 02:56 PM IST
सार
शुभांशु शुक्ला के पृथ्वी पर लौटने के बाद क्या-क्या होना है? उन्हें और उनके साथियों को प्रशांत महासागर में गिरे कैप्सूल से कैसे निकाला जाएगा? इसके अलावा उन्हें कहां और कैसे ले जाया जाएगा? अगले कुछ दिनों तक नासा उन्हें किस तरह परखेगा? शुभांशु और उनके साथियों को पृथ्वी पर लौटने के बाद किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है? इसके अलावा उनकी भारत वापसी कब तक संभव होगी? आइये जानते हैं...
अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) पर गए भारत के अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला स्पेसएक्स के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट के कैप्सूल में बैठकर पृथ्वी पर लौट आए हैं। दोपहर करीब 3 बजे उन्हें और उनके तीन अन्य साथियों को लेकर कैप्सूल पृथ्वी पर उतरा। हालांकि, न तो शुभांशु की आईएसएस से लौटने की यात्रा बहुत आसान रहने वाली है और न ही पृथ्वी पर उतरने के बाद भी उन्हें यहां के वातावरण से बहुत सहूलियत मिलने वाली है।
रिपोर्ट्स की मानें तो हो सकता है कि शुभांशु और उनके साथियों को कैलिफोर्निया के पास प्रशांत महासागर में ड्रैगन कैप्सूल से निकालने के बाद या तो सहारा देकर या फिर स्ट्रेचर पर बिठाकर गंतव्य पर वापस ले जाया जाएगा। इस दौरान एक्सिओम-4 मिशन क्रू को सिर्फ चलने में ही नहीं देखने तक में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
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एक्सिओम-4 मिशन में रही शुभांशु शुक्ला की अहम भूमिका।
- फोटो : अमर उजाला
अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) पर गए भारत के अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला स्पेसएक्स के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट के कैप्सूल में बैठकर पृथ्वी पर लौट आए हैं। दोपहर करीब 3 बजे उन्हें और उनके तीन अन्य साथियों को लेकर कैप्सूल पृथ्वी पर उतरा। हालांकि, न तो शुभांशु की आईएसएस से लौटने की यात्रा बहुत आसान रहने वाली है और न ही पृथ्वी पर उतरने के बाद भी उन्हें यहां के वातावरण से बहुत सहूलियत मिलने वाली है।
रिपोर्ट्स की मानें तो हो सकता है कि शुभांशु और उनके साथियों को कैलिफोर्निया के पास प्रशांत महासागर में ड्रैगन कैप्सूल से निकालने के बाद या तो सहारा देकर या फिर स्ट्रेचर पर बिठाकर गंतव्य पर वापस ले जाया जाएगा। इस दौरान एक्सिओम-4 मिशन क्रू को सिर्फ चलने में ही नहीं देखने तक में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर शुभांशु शुक्ला के पृथ्वी पर लौटने के बाद क्या-क्या होगा? उन्हें और उनके साथियों को प्रशांत महासागर में गिरे कैप्सूल से कैसे निकाला जाएगा? इसके अलावा उन्हें कहां और कैसे ले जाया जाएगा? अगले कुछ दिनों तक नासा उन्हें किस तरह परखेगा? शुभांशु और उनके साथियों को पृथ्वी पर लौटने के बाद किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है? इसके अलावा उनकी भारत वापसी कब तक संभव होगी? आइये जानते हैं...
पहले जानें- शुभांशु के लिए कैसा रहा आईएसएस का सफर?
शुभांशु शुक्ला को एक्सिओम-4 मिशन के तहत 25 जून 2025 को नासा के कैनेडी स्पेस सेंटर से स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल में बिठाकर रवाना किया गया था। उनकी लॉन्चिंग फैल्कन-9 रॉकेट के जरिए कराई गई थी। 26 जून को एक्सिओम-4 आईएसएस पर डॉक कर गया था। इसके बाद शुभांशु और उनके साथी अंतरिक्ष यात्रियों को 14 दिन तक अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर प्रयोगों में हिस्सा लेना था। हालांकि, मिशन की अवधि कुछ दिन के लिए बढ़ा दी गई। इस दौरान शुभांशु और उनकी टीम ने 60 से ज्यादा प्रयोगों में हिस्सा लिया। इनमें इंसानों के स्वास्थ्य से लेकर अंतरिक्ष में कृषि विज्ञान, मनोवैज्ञानिक स्थिति और स्पेस सूट के मैटेरियल तक को लेकर टेस्ट शामिल रहे। अब जब एक्सिओम-4 मिशन पृथ्वी पर लौटेगा तो इसमें 250 किलोग्राम के करीब कार्गो होगा, जिसमें वैज्ञानिक प्रयोगों से जुड़े सैंपल्स और उपकरण शामिल होंगे।
14 जुलाई को रवाना होने से पहले तक शुभांशु शुक्ला आईएसएस पर 18 दिन बिता चुके थे। इस दौरान उन्होंने पृथ्वी के 288 चक्कर पूरे किए। शुभांशु ने आईएसएस पर अपने सफर के दौरान कई दिनों तक गुरुत्वाकर्षण बल की गैरमौजूदगी या कह सकते हैं बिल्कुल हल्की मौजूदगी महसूस की। इसके चलते उन्हें आईएसएस में सामंजस्य बिठाने में काफी समय लगा। उन्होंने अपने सफर की शुरुआत में कहा था कि आईएसएस के माइक्रोग्रैविटी वाले माहौल में शुरू के दो दिन उन्हें काफी अजीब लगा। एक बातचीत के दौरान शुभांशु ने बताया था कि यह उनका पहली बार (सफर) है। आईएसएस पर पहुंचने के बाद उन्हें कई सारे अलग अनुभव हुए। शुभांशु ने कहा कि वे उम्मीद कर रहे हैं कि जब वे पृथ्वी पर वापस लौटें तो उन्हें इस तरह की मुश्किल न झेलनी पड़े।
शुभांशु के पृथ्वी पर लौटने के बाद क्या होगा?
नासा के पूर्व अंतरिक्ष यात्री और वर्तमान मिशन डायरेक्टर डॉ. रॉबर्ट कैबाना कहते हैं, पृथ्वी पर लौटना एक नियंत्रित दुर्घटना की तरह है। हर मिशन का आखिरी 10 मिनट ही सबसे कठिन होता है। अंतरिक्ष में जाना जितना कठिन है, लौटना उससे भी अधिक जोखिमपूर्ण और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है। लेकिन वर्षों की इंजीनियरिंग विशेषज्ञता, परीक्षणों और आपातकालीन योजना ने इस प्रक्रिया को आज एक रूटीन ऑपरेशन बना दिया है फिर भी हर वापसी एक नया परीक्षण होती है।
पृथ्वी पर एक्सिओम-4 के क्रू को क्या-क्या दिक्क्तें आएंगी?
1. फ्लू जैसी स्थिति, चलने में दिक्कतें
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, शुभांशु और उनके साथियों की वापसी बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाली। पृथ्वी पर आईएसएस के मुकाबले माहौल काफी अलग है। दरअसल, अंतरिक्ष का माहौल जीरो ग्रैविटी वाला होता है। यानी यहां अंतरिक्ष यात्री एक कदम में कई फीट की दूरी पूरी कर लेते हैं। इतना ही नहीं कई मौकों पर तो उन्हें स्पेसशिप पर घंटों पैर भी नहीं रखना पड़ता। ऐसे में ठोस सतहों पर उनके पैरों की दबाव डालने की क्षमता कम हो जाती है और उनके पैरों में मौजूद मांसपेशियों का मोटा हिस्सा कम होता है।
इसके चलते पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल की मौजूदगी की वजह से अब जब वे चलने की कोशिश करेंगे तो उन्हें ठोस सतह पर पैर बढ़ाने में भी दिक्कतें आएंगी और कमजोरी महसूस होगी। साथ ही उन्हें अपने कदम छोटे-छोटे लगेंगे, जिसे 'बेबी फीट' कंडीशन कहा जाता है। इतना ही नहीं एक्सिओम-4 के क्रू को पृथ्वी पर कुछ समय के लिए चक्कर आने और जी मिचलाने की शिकायत भी होगी।
पूर्व के अंतरिक्ष यात्रियों के अनुभवों की मानें तो आईएसएस के जीरो ग्रैविटी माहौल से लौटने के बाद उन्हें अपना वजन काफी भारी लगता है। इतना ही नहीं उन्हें चक्कर और फ्लू जैसा संक्रमण महसूस होता है। अंतरिक्ष से लौटने के बाद शरीर को पृथ्वी के माहौल में ढलने के लिए कम से कम एक हफ्ता लगता है। माना जा रहा है कि पेगी व्हिट्सन को छोड़कर बाकी तीन अंतरिक्ष यात्रियों के लिए पृथ्वी के माहौल में ढलने के लिए यह समय कुछ ज्यादा भी हो सकता है।
2. कमजोर दिल
अंतरिक्ष में रहने के दौरान एस्ट्रोनॉट्स की हड्डियों का घनत्व कम हो जाता है, जो कि जल्दी ठीक नहीं होता। इसके अलावा उनके शरीर में मांस भी कम होता है। इससे हाथ-पैर कमजोर होते हैं। यहां तक कि दिल पर भी इसका असर होता है, क्योंकि जहां पृथ्वी पर हृदय को खून का प्रवाह बनाए रखने के लिए गुरुत्वाकर्षण के उलट भी काम करना होता है, वहीं अंतरिक्ष में जीरो ग्रैविटी में हृदय पर यह अतिरिक्त बल नहीं पड़ता।
चूंकि शुभांशु 18 दिन तक अंतरिक्ष में रहे हैं, इसलिए उनका दिल फिलहाल जीरो ग्रैविटी में काम करने का आदि हो गया है। उसे खून को शरीर के हर अंग में पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। अब जब वे पृथ्वी पर लौटेंगे तो उनके दिल को गुरुत्वाकर्षण बल के खिलाफ भी खून का प्रवाह बनाना होगा। यानी उनके कमजोर दिल को फिर से पृथ्वी के हिसाब से मजबूती दिखानी होगी। इसमें कई बार काफी समय लगता है और शरीर के हर अंग तक खून का प्रवाह समय पर बन नहीं पाता। इससे अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर में खून का थक्का जमने (ब्लड क्लॉटिंग) का खतरा बढ़ जाता है।
3. दिमाग पर असर
इतना ही नहीं जीरो ग्रैविटी वाले माहौल से पृथ्वी पर आने के बाद अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर में मौजूद फ्लुइड दिमाग के आसपास इकट्ठा होने लगता है। इसके चलते उन्हें फ्लू का अहसास होता है। एस्ट्रोफिजिसिस्ट्स के मुताबिक, इस फ्लुइड की वजह से अंतरिक्ष यात्रियों की आंखों की पुतली का आकार बदल जाता है और उन्हें देखने में दिक्कतें आती हैं। पृथ्वी पर लौटने के बाद एस्ट्रोनॉट्स को कई बार चश्मे की जरूरत भी पड़ती है।